दिन Poetry (page 46)

दरिया को अपने पाँव की कश्ती से पार कर

रशीद निसार

वस्ल के दिन का इशारा है कि ढल जाऊँगा

रशीद लखनवी

ठहर जावेद के अरमाँ दिल-ए-मुज़्तर निकलते हैं

रशीद लखनवी

शराब-ए-नाब का क़तरा जो साग़र से निकल जाए

रशीद लखनवी

जो मुझे मर्ग़ूब हो वो सोगवारी चाहिए

रशीद लखनवी

दिला मा'शूक़ जो होता है वो सफ़्फ़ाक होता है

रशीद लखनवी

बाग़ में जुगनू चमकते हैं जो प्यारे रात को

रशीद लखनवी

आप दिल जा कर जो ज़ख़्मी हो तो मिज़्गाँ क्या करे

रशीद लखनवी

हिम्मत-ए-आली का इतना तो ज़ियाँ होना ही था

रशीद कौसर फ़ारूक़ी

रिश्ता-ए-दिल भी किसी दिन ख़्वाब सा हो जाएगा

रशीद कामिल

उन की ख़ल्वत में 'रसा' भी होगा

रसा रामपुरी

शाम से पहले घर गए होते

रसा चुग़ताई

मुमकिन है वो दिन आए कि दुनिया मुझे समझे

रसा चुग़ताई

'मीर'-जी से अगर इरादत है

रसा चुग़ताई

जब तक दौर-ए-जाम चलेगा

रसा चुग़ताई

हाथ में ख़ंजर आ सकता है

रसा चुग़ताई

परिंदे होते अगर हम हमारे पर होते

रऊफ़ अमीर

यक़ीनन है कोई माह-ए-मुनव्वर पीछे चिलमन के

रंजूर अज़ीमाबादी

रोता हमें जो देखा दिल उस का पिघल गया

रंजूर अज़ीमाबादी

ता हश्र रहे ये दाग़ दिल का

रंगीन सआदत यार ख़ाँ

मेरी ईज़ा में ख़ुशी जब आप की पाते हैं लोग

रंगीन सआदत यार ख़ाँ

इश्क़ से बच के किधर जाएँगे हम

रंगीन सआदत यार ख़ाँ

रखो तुम बंद बे-शक अपनी घड़ियाँ

राणा गन्नौरी

मोहब्बतों के लिए उम्र कम है सो वो शख़्स

राना आमिर लियाक़त

हर साँस नई साँस है हर दिन है मिरा दिन

राना आमिर लियाक़त

ये जो चार दिन की थी ज़िंदगी इसे तेरे नाम न कर सका

राना आमिर लियाक़त

सुनते हैं कि मिल जाती है हर चीज़ दुआ से

राना अकबराबादी

तुम्हारे साथ कई रंज बाँटने हैं हमें

रम्ज़ी असीम

ज़िंदगी मुझ को कहाँ ले आई है

रमज़ान अली सहर

इस सदी का जब कभी ख़त्म-ए-सफ़र देखेंगे लोग

रम्ज़ अज़ीमाबादी

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