दिन Poetry (page 65)

है बज़्म-ए-बुताँ में सुख़न आज़ुर्दा-लबों से

ग़ालिब

है बस-कि हर इक उन के इशारे में निशाँ और

ग़ालिब

ग़ैर लें महफ़िल में बोसे जाम के

ग़ालिब

गई वो बात कि हो गुफ़्तुगू तो क्यूँकर हो

ग़ालिब

दाइम पड़ा हुआ तिरे दर पर नहीं हूँ मैं

ग़ालिब

बिसात-ए-इज्ज़ में था एक दिल यक क़तरा ख़ूँ वो भी

ग़ालिब

इसी ख़याल में दिन-रात मैं तड़पता हूँ

जोर्ज पेश शोर

ये फ़र्क़ जीते ही जी तक गदा-ओ-शाह में है

जोर्ज पेश शोर

सुब्हों जैसे लोग

गीताञ्जलि राय

अगर हो चश्म-ए-हक़ीक़त तो देख क्या हूँ मैं

ग़व्वास क़ुरैशी

वो टुकड़ा रात का बिखरा हुआ सा

गौतम राजऋषि

उजले मैले पेश हुए

गौहर होशियारपुरी

है जो भी जज़ा सज़ा अता हो

गौहर होशियारपुरी

दुखी दिलों में, दुखी साथियों में रहते थे

गौहर होशियारपुरी

आइए ऐ जान-ए-आलम आइए

गौहर बेगम गौहर

फैमली-प्लैनिंग

फ़ुर्क़त काकोरवी

मेहनत-ओ-दर्द-ओ-रंज-ओ-ग़म और अलम ये रात दिन

फ्रांस गॉड्लिब क्वीन फ़्रेस्को

ये माना ज़िंदगी है चार दिन की

फ़िराक़ गोरखपुरी

ग़रज़ कि काट दिए ज़िंदगी के दिन ऐ दोस्त

फ़िराक़ गोरखपुरी

शाम-ए-अयादत

फ़िराक़ गोरखपुरी

जुगनू

फ़िराक़ गोरखपुरी

हिण्डोला

फ़िराक़ गोरखपुरी

आधी रात

फ़िराक़ गोरखपुरी

वो चुप-चाप आँसू बहाने की रातें

फ़िराक़ गोरखपुरी

सुना तो है कि कभी बे-नियाज़-ए-ग़म थी हयात

फ़िराक़ गोरखपुरी

रस्म-ओ-राह-ए-दहर क्या जोश-ए-मोहब्बत भी तो हो

फ़िराक़ गोरखपुरी

कमी न की तिरे वहशी ने ख़ाक उड़ाने में

फ़िराक़ गोरखपुरी

जौर-ओ-बे-मेहरी-ए-इग़्माज़ पे क्या रोता है

फ़िराक़ गोरखपुरी

अब दौर-ए-आसमाँ है न दौर-ए-हयात है

फ़िराक़ गोरखपुरी

आज भी क़ाफ़िला-ए-इश्क़ रवाँ है कि जो था

फ़िराक़ गोरखपुरी

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