दिन Poetry (page 66)

छुप गया दिन क़दम बढ़ा राही

फ़िगार उन्नावी

कुछ काम तो आया दिल-ए-नाकाम हमारा

फ़िगार उन्नावी

जुरअत-ए-इश्क़ हवस-कार हुई जाती है

फ़िगार उन्नावी

एक नज़्म

फ़ज़्ल ताबिश

ये सन्नाटा बहुत महँगा पड़ेगा

फ़ज़्ल ताबिश

रिश्ता खुजियाया हुआ कुत्ता है

फ़ज़्ल ताबिश

रातों के ख़ौफ़ दिन की उदासी ने क्या दिया

फ़ज़्ल ताबिश

न कर शुमार कि हर शय गिनी नहीं जाती

फ़ज़्ल ताबिश

मिलों के शहर में घटता हुआ दिन सोचता होगा

फ़ज़्ल ताबिश

ख़्वाहिशों के हिसार से निकलो

फ़ज़्ल ताबिश

कली कली का बदन फोड़ कर जो निकला है

फ़ज़्ल ताबिश

बहार आई गुल-अफ़्शानी के दिन हैं

फ़ज़्ल अहमद करीम फ़ज़ली

अब वो महकी हुई सी रात नहीं

फ़ज़्ल अहमद करीम फ़ज़ली

मुद्दत के ब'अद आज मैं ऑफ़िस नहीं गया

फ़ाज़िल जमीली

मैं ही अपनी क़ैद में था और मैं ही एक दिन

फ़ाज़िल जमीली

ज़िंदगानी को अदम-आबाद ले जाने लगा

फ़ाज़िल जमीली

मिलने का भी आख़िर कोई इम्कान बनाते

फ़ाज़िल जमीली

हम ने किसी की याद में अक्सर शराब पी

फ़ाज़िल जमीली

ये दौर कैसा है या-इलाही कि दोस्त दुश्मन से कम नहीं है

फ़ाज़िल अंसारी

चमक सितारों की नज़रों पे बार गुज़री है

फ़ाज़िल अंसारी

एक दिन ग़र्क़ न कर दे तुझे ये सैल-ए-वजूद

फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी

पाया-ए-ख़िश्त-ओ-ख़ज़फ़ और गुहर से ऊँचा

फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी

जुरअत-ए-इज़हार से रोकेगी क्या

फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी

हाथ फैलाओ तो सूरज भी सियाही देगा

फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी

ग़ज़ल के पर्दे में बे-पर्दा ख़्वाहिशें लिखना

फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी

जुगनू हवा में ले के उजाले निकल पड़े

फ़य्याज़ फ़ारुक़ी

अलमिया-ए-नक़्द

फ़े सीन एजाज़

समुंदर सर पटक कर मर रहा था

फ़े सीन एजाज़

ख़र्च जब हो गई जज़्बों की रक़म आप ही आप

फ़े सीन एजाज़

उस की गली में ज़र्फ़ से बढ़ कर मिला मुझे

फ़व्वाद अहमद

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