दिन Poetry (page 68)

आई ख़िज़ाँ चमन में गए दिन बहार के

फ़रहत क़ादरी

न दौलत की तलब थी और न दौलत चाहिए है

फ़रहत नदीम हुमायूँ

मोहब्बत का ये रुख़ देखा नहीं था

फ़रहत नदीम हुमायूँ

वस्ल के लम्हे कहानी हो गए

फ़रहत कानपुरी

ख़ुद-आगही

फ़रहत एहसास

बिछड़े घर का साया

फ़रहत एहसास

ज़मीं ने लफ़्ज़ उगाया नहीं बहुत दिन से

फ़रहत एहसास

वो महफ़िलें पुरानी अफ़्साना हो रही हैं

फ़रहत एहसास

उस को है इश्क़ बताना भी नहीं चाहता है

फ़रहत एहसास

ठोकरें खा के सँभलना नहीं आता है मुझे

फ़रहत एहसास

नहीं देखता दिन जिसे चश्म-ए-शब देखती है

फ़रहत एहसास

महफ़िल में अब के आओ तो ऐसी ख़ता न हो

फ़रहत एहसास

ख़िलाफ़-ए-गर्दिश-ए-मा'मूल होना चाहता हूँ

फ़रहत एहसास

काम उन आँखों की हवसनाकी की साज़िश आ गई

फ़रहत एहसास

इश्क़ में कितने बुलंद इम्कान हो जाते हैं हम

फ़रहत एहसास

ईमाँ का लुत्फ़ पहलू-ए-तश्कीक में मिला

फ़रहत एहसास

हम न प्यासे हैं न पानी के लिए आए हैं

फ़रहत एहसास

हम अपने आप को अपने से कम भी करते रहते हैं

फ़रहत एहसास

गर अपने आप में इंसान बढ़ता जा रहा है

फ़रहत एहसास

एक ग़ज़ल कहते हैं इक कैफ़िय्यत तारी कर लेते हैं

फ़रहत एहसास

औरों का सारा काम मुझे दे दिया गया

फ़रहत एहसास

आया ज़रा सी देर रहा ग़ुल गया बदन

फ़रहत एहसास

जल्वा है वो कि ताब-ए-नज़र तक नहीं रही

फ़रहत अब्बास

खो बैठी है सारे ख़द-ओ-ख़ाल अपनी ये दुनिया

फ़रहान सालिम

'फ़रीद' इक दिन सहारे ज़िंदगी के टूट जाएँगे

फ़रीद परबती

तमन्ना अपनी उन पर आश्कारा कर रहा हूँ मैं

फ़रीद परबती

राख उड़ती हुई बालों में नज़र आती है

फ़रह इक़बाल

इक दिन वो मेरे ऐब गिनाने लगा 'फ़राग़'

फ़राग़ रोहवी

जिस दिन से कोई ख़्वाहिश-ए-दुनिया नहीं रखता

फ़राग़ रोहवी

दिन में भी हसरत-ए-महताब लिए फिरते हैं

फ़राग़ रोहवी

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