गर अपने आप में इंसान बढ़ता जा रहा है

गर अपने आप में इंसान बढ़ता जा रहा है

तो फिर क्यूँ इस क़दर बोहरान बढ़ता जा रहा है

सिमटता जा रहा है दायरा मालिक मकाँ का

मकाँ पर क़ब्ज़ा-ए-मेहमान बढ़ता जा रहा है

मुझे लगता है सहरा की तरफ़ जाना पड़ेगा

दर-ओ-दीवार का एहसान बढ़ता जा रहा है

बहुत दिन हो गए रोया न अपने हाल पे शहर

दिलों में ख़ित्ता-ए-वीरान बढ़ता जा रहा है

बहुत सा हुस्न पहली बार देखा है किसी ने

तू उस की ही तरफ़ हैरान बढ़ता जा रहा है

बदन ख़ाली करो और कश्ती-ए-जाँ को बचाओ

ख़तरनाकी का ये सामान बढ़ता जा रहा है

नुमू करना सुना है जान-दारों की सिफ़त है

मगर ये शहर तो बे-जान बढ़ता जा रहा है

न जाने कितने भूखों की किफ़ालत हो रही है

हवस-कारी का दस्तर-ख़्वान बढ़ता जा रहा है

मियाँ 'एहसास-जी' कुछ शाइ'री भी करते रहिए

ये माना आप का दीवान बढ़ता जा रहा है

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