दिन Poetry (page 69)

देखा जो आईना तो मुझे सोचना पड़ा

फ़राग़ रोहवी

फटी मश्कें लिए दिन-रात दरिया देखने वाले

फ़क़ीह हैदर

सुने जाते न थे तुम से मिरे दिन-रात के शिकवे

फ़ानी बदायुनी

सुने जाते न थे तुम से मिरे दिन रात के शिकवे

फ़ानी बदायुनी

ऐ बे-ख़ुदी ठहर कि बहुत दिन गुज़र गए

फ़ानी बदायुनी

ज़ीस्त का हासिल बनाया दिल जो गोया कुछ न था

फ़ानी बदायुनी

तेरा निगाह-ए-शौक़ कोई राज़-दाँ न था

फ़ानी बदायुनी

क़िस्सा-ए-ज़ीस्त मुख़्तसर करते

फ़ानी बदायुनी

क्यूँ न नैरंग-ए-जुनूँ पर कोई क़ुर्बां हो जाए

फ़ानी बदायुनी

कुछ कम तो हुआ रंज-ए-फ़रावान-ए-तमन्ना

फ़ानी बदायुनी

बिजलियाँ टूट पड़ीं जब वो मुक़ाबिल से उठा

फ़ानी बदायुनी

बे-ज़ौक़-ए-नज़र बज़्म-ए-तमाशा न रहेगी

फ़ानी बदायुनी

ऐ बे-ख़ुदी ठहर कि बहुत दिन गुज़र गए

फ़ानी बदायुनी

आप से शरह-ए-आरज़ू तो करें

फ़ानी बदायुनी

आह अब तक तो बे-असर न हुई

फ़ानी बदायुनी

दुनिया पे ऐसा वक़्त पड़ेगा कि एक दिन

फ़ना निज़ामी कानपुरी

यूँ इंतिक़ाम तुझ से फ़स्ल-ए-बहार लेंगे

फ़ना निज़ामी कानपुरी

वो ख़ानुमाँ-ख़राब न क्यूँ दर-ब-दर फिरे

फ़ना निज़ामी कानपुरी

हम आगही-ए-इश्क़ का अफ़्साना कहेंगे

फ़ना निज़ामी कानपुरी

दिल से अगर कभी तिरा अरमान जाएगा

फ़ना निज़ामी कानपुरी

आग़ाज़ तो अच्छा था 'फ़ना' दिन भी भले थे

फ़ना बुलंदशहरी

जब तक मिरे होंटों पे तिरा नाम रहेगा

फ़ना बुलंदशहरी

रेशम ज़ुल्फ़ के तार भी बातें करते हैं

फख़्र अब्बास

तेरी ही सैर के लिए आता रहूँगा बार बार

फ़ैज़ान हाशमी

मिरे वजूद को मौजूदगी दिखाती थी

फ़ैज़ान हाशमी

इसी जहाज़ के सहरा में डूब जाने की

फ़ैज़ान हाशमी

दोनों जहाँ से आ गया कर के इधर उधर की सैर

फ़ैज़ान हाशमी

अपने ख़ला में ला कि ये तुम को दिखा रहा हूँ मैं

फ़ैज़ान हाशमी

दिन उतरते ही नई शाम पहन लेता हूँ

फ़ैज़ ख़लीलाबादी

मामूली बे-कार समझने वाले मुझ से दूर रहें

फ़ैज़ आलम बाबर

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