दिया Poetry (page 41)

तन्हाई

राही मासूम रज़ा

तल्ख़-ओ-तुर्श

राही मासूम रज़ा

दिलों की राह पर आख़िर ग़ुबार सा क्यूँ है

राही मासूम रज़ा

हम न होते काख़-ए-मुश्त-ए-ख़ाक होता ग़ालिबन

राही फ़िदाई

कहाँ न-जाने चला गया इंतिज़ार कर के

इरफ़ान सत्तार

कभी किसी से न हम ने कोई गिला रक्खा

इरफ़ान सत्तार

अजब है रंग-ए-चमन जा-ब-जा उदासी है

इरफ़ान सत्तार

मैं कई बरसों से तेरी जुस्तुजू करती रही

इरम ज़ेहरा

कितनी दूर से चलते चलते ख़्वाब-नगर तक आई हूँ

इरम ज़ेहरा

कैसे बनाऊँ हाथ पर तस्वीर ख़्वाब की

इरम ज़ेहरा

पैग़ाम-ए-रिहाई दिया हर चंद क़ज़ा ने

इक़बाल सुहैल

कहाँ ताक़त ये रूसी को कहाँ हिम्मत ये जर्मन को

इक़बाल सुहैल

अब दिल को हम ने बंदा-ए-जानाँ बना दिया

इक़बाल सुहैल

हर घड़ी का साथ दुख देता है जान-ए-मन मुझे

इक़बाल साजिद

ग़ार से संग हटाया तो वो ख़ाली निकला

इक़बाल साजिद

ग़ार से संग हटाया तो वो ख़ाली निकला

इक़बाल साजिद

अपनी अना की आज भी तस्कीन हम ने की

इक़बाल साजिद

बख़्शे न गए एक को बख़्शा न कभी

इक़बाल ख़ुसरो क़ादरी

आँखों के चराग़ वारते हैं

इक़बाल ख़ुसरो क़ादरी

वो भी रो रो के बुझा डाला है अब आँखों ने

इक़बाल कौसर

तिरे जुज़्व जुज़्व ख़याल को रग-ए-जाँ में पूरा उतार कर

इक़बाल कौसर

मिरी ख़ाक उस ने बिखेर दी सर-ए-रह ग़ुबार बना दिया

इक़बाल कौसर

मिरी ख़ाक उस ने बिखेर दी सर-ए-रह ग़ुबार बना दिया

इक़बाल कौसर

काहिश-ए-ग़म ने जिगर ख़ून किया अंदर से

इक़बाल कौसर

मोहब्बतों को भी उस ने ख़ता क़रार दिया

इक़बाल कैफ़ी

यही नहीं कि निगाहों को अश्क-बार किया

इक़बाल कैफ़ी

सुना है उस ने ख़िज़ाँ को बहार करना है

इक़बाल कैफ़ी

माना कि ज़िंदगी से हमें कुछ मिला भी है

इक़बाल अज़ीम

किसी को खो के पा लिया किसी को पा के खो दिया

इक़बाल अशहर

कभी कसक जुदाई की कभी महक विसाल की

इक़बाल अशहर

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