दुनिया Poetry (page 83)

बग़ौर देख रहा है अदा-शनास मुझे

आरज़ू लखनवी

आराम के थे साथी क्या क्या जब वक़्त पड़ा तो कोई नहीं

आरज़ू लखनवी

तक़दीर हो ख़राब तो तदबीर क्या करे

अरुण कुमार आर्य

दिल की बाज़ी लगा के देख लिया

अरुण कुमार आर्य

हमारी महफ़िलों में बे-हिजाब आने से क्या होगा

अर्शी रामपुरी

फ़लसफ़ी किस लिए इल्ज़ाम-ए-फ़ना देता है

अर्शी भोपाली

दर्द के साँचे में ढल कर रह गई

अर्शी भोपाली

फ़ज़ा है तीरा ओ तारीक और उस का ख़याल

अरशद सिद्दीक़ी

वो जिस ने मेरे दिल ओ जाँ में दर्द बोया है

अरशद सिद्दीक़ी

मैं तिरे शहर से गुज़रा हूँ बगूले की तरह

अरशद महमूद नाशाद

हम जुनूँ पेशा कि रहते थे तिरी ज़ात में गुम

अरशद महमूद नाशाद

फैलती जा रही है ये दुनिया

अरशद लतीफ़

एक सूरत तिरी बनाने में

अरशद लतीफ़

फिर चंद दिनों से वो हर शब ख़्वाबों में हमारे आते हैं

अरशद काकवी

दिखाती है जो ये दुनिया वो बैठा देखता हूँ मैं

अरशद जमाल 'सारिम'

उस का अंजाम भला हो कि बुरा हो कुछ हो

अरशद जमाल हश्मी

सपेदी रंग-ए-जहाँ में नहीं मिलाता हूँ

अरशद जमाल हश्मी

उम्र तो अपनी हुई सब बुत-परस्ती में बसर

अरशद अली ख़ान क़लक़

ये बोले जो उन को कहा बे-मुरव्वत

अरशद अली ख़ान क़लक़

वाइज़ की ज़िद से रिंदों ने रस्म-ए-जदीद की

अरशद अली ख़ान क़लक़

तासीर जज़्ब मस्तों की हर हर ग़ज़ल में है

अरशद अली ख़ान क़लक़

ये दुनिया अकबर ज़ुल्मों की हम मजबूरी की अनारकली

अरशद अब्दुल हमीद

मिरे ख़ेमे ख़स्ता-हाल में हैं मिरे रस्ते धुँद के जाल में हैं

अरशद अब्दुल हमीद

मेहर ओ महताब को मेरे ही निशाँ जानती है

अरशद अब्दुल हमीद

कोई भी शय हो मियाँ जान से प्यारी किसे है

अरशद अब्दुल हमीद

इश्क़ मरहून-ए-हिकायात-ओ-गुमाँ भी होगा

अरशद अब्दुल हमीद

चिराग़-ए-दर्द कि शम-ए-तरब पुकारती है

अरशद अब्दुल हमीद

नूर-अफ़शाँ है वो ज़ुल्मत में उजालों की तरह

अर्श सहबाई

कश्ती-ए-दिल नज़्र-ए-तूफ़ाँ हो गई

अर्श सहबाई

तिरी दुनिया को ऐ वाइज़ मिरी दुनिया से क्या निस्बत

अर्श मलसियानी

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