फ़लक Poetry (page 4)

तेरा ये हुस्न-ए-बे-कराँ मुक़य्यद ज़मान है

सय्यद तम्जीद हैदर तम्जीद

कुछ देर हुई है कि मैं बेबाक हुआ हूँ

सय्यद तम्जीद हैदर तम्जीद

इंसान की हालत पर अब वक़्त भी हैराँ है

सय्यद सग़ीर सफ़ी

क्लर्क

सय्यद मोहम्मद जाफ़री

अब और तब

सय्यद मोहम्मद जाफ़री

ज़मीन फ़र्श फ़लक साएबान लिखते हैं

सय्यद मेराज जामी

ये कैसी आया-ए-मोजिज़-नुमा निकल आई

सय्यद काशिफ़ रज़ा

क्यूँ मिल रही है उन को सज़ा चीख़ती रही

सय्यद अनवार अहमद

इक चाँद है आवारा-ओ-बेताब ओ फ़लक-ताब

सय्यद अमीन अशरफ़

न जाने जाए कहाँ तक ये सिलसिला दिल का

सय्यद अमीन अशरफ़

लरज़ रहा था फ़लक अर्ज़-ए-हाल ऐसा था

सय्यद अमीन अशरफ़

दिल शहर-ए-तहय्युर है कि वो मम्लिकत-आरा

सय्यद अमीन अशरफ़

सूने सूने से फ़लक पर इक घटा बनती हुई

स्वप्निल तिवारी

दिन के पहले पहर में ही अपना बिस्तर छोड़ कर

स्वप्निल तिवारी

दिन के पहले पहर मैं ही अपना बिस्तर छोड़ कर

स्वप्निल तिवारी

ब-ख़ुदा इश्क़ का आज़ार बुरा होता है

सुरूर जहानाबादी

अपनी अना के गुम्बद-ए-बे-दर में बंद है

सूरज तनवीर

साअत-ए-मर्ग-ए-मुसलसल हर नफ़स भारी हुई

सुल्तान अख़्तर

तुम किस से मिलने आए हो

सुलैमान अरीब

उठिए तो कहाँ जाइए जो कुछ है यहीं है

सुहा मुजद्ददी

किसी में ताब-ए-अलम नहीं है किसी में सोज़-ए-वफ़ा नहीं है

सूफ़ी तबस्सुम

कभी जुदा दो बदन हुए तो दिलों पे ये दो अज़ाब उतरे

सोज़ नजीबाबादी

सर्व-ए-गुलशन पर सुख़न उस क़द का बाला हो गया

सिराज औरंगाबादी

क्यूँ तिरे गेसू कूँ गेसू बोलनाँ

सिराज औरंगाबादी

तुझ तक गुज़र किसी का ऐ गुल-बदन न देखा

शऊर बलगिरामी

अश्क जो आँख में उबलते हैं

शुजा

हर सम्त फ़लक-बोस पहाड़ों की क़तारें

शोहरत बुख़ारी

वहशत का कहीं असर नहीं है

शोहरत बुख़ारी

हम शहर में इक शम्अ की ख़ातिर हुए बर्बाद

शोहरत बुख़ारी

इक ज़माने से फ़लक ठहरा हुआ लगता है

शोहरत बुख़ारी

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