फ़लक Poetry (page 6)

ज़ोर यारो आज हम ने फ़तह की जंग-ए-फ़लक

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

कशिश से दिल की उस अबरू-कमाँ को हम रखा बहला

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

कशिश से दिल की उस अबरू कमाँ को हम रखा बहला

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

जुम्बिश-ए-दिल नहीं बेजा तू किधर भूला है

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

आता है ख़ौफ़ आँख झपकते हुए मुझे

शहज़ाद अहमद

घर जला लेता है ख़ुद अपने ही अनवार से तू

शहज़ाद अहमद

दिल बहुत मसरूफ़ था कल आज बे-कारों में है

शहज़ाद अहमद

बाग़-ए-बहिश्त के मकीं कहते हैं मर्हबा मुझे

शहज़ाद अहमद

अब निभानी ही पड़ेगी दोस्ती जैसी भी है

शहज़ाद अहमद

ज़मीं से ता-ब-फ़लक धुँद की ख़ुदाई है

शहरयार

हवा चले वरक़-ए-आरज़ू पलट जाए

शहरयार

मुन्तज़िम

शहनाज़ नबी

मीनारों से ऊपर निकला दीवारों से पार हुआ

शाहिद मीर

ज़मीं तश्कील दे लेते फ़लक ता'मीर कर लेते

शाहिद लतीफ़

नन्हा सा दिया है कि तह-ए-आब है रौशन

शाहिद कमाल

मौसम की विरासत

शाहीन ग़ाज़ीपुरी

ख़ाक-ज़ादा हूँ मगर ता-ब फ़लक जाता है

शहबाज़ ख़्वाजा

था बाम-ए-फ़लक ख़ाक-बसर आने लगा हूँ

शहाब सफ़दर

हयात में भी अजल का समाँ दिखाई दे

शहाब जाफ़री

क्या दिखाता है फ़लक-ए-गर्म तू नान-ए-ख़ुर्शीद

शाह नसीर

हम वो फ़लक हैं अहल-ए-तवक्कुल कि मिस्ल-ए-माह

शाह नसीर

उठती घटा है किस तरह बोले वो ज़ुल्फ़ उठा कि यूँ

शाह नसीर

सदा है इस आह-ओ-चश्म-ए-तर से फ़लक पे बिजली ज़मीं पे बाराँ

शाह नसीर

मिल बैठने ये दे है फ़लक एक दम कहाँ

शाह नसीर

मैं ने बिठला के जो पास उस को खिलाया बीड़ा

शाह नसीर

मैं ज़ोफ़ से जूँ नक़्श-ए-क़दम उठ नहीं सकता

शाह नसीर

जब तलक चर्ब न जूँ शम्-ए-ज़बाँ कीजिएगा

शाह नसीर

हम फड़क कर तोड़ते सारी क़फ़स की तीलियाँ

शाह नसीर

दिल इश्क़-ए-ख़ुश-क़दाँ में जो ख़्वाहान-ए-नाला था

शाह नसीर

चश्म में कब अश्क भर लाते हैं हम

शाह नसीर

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