शोक Poetry (page 146)

बस एक बात की उस को ख़बर ज़रूरी है

आफ़ताब हुसैन

कहूँ जो कर्ब फ़क़त कर्ब-ए-ज़ात समझोगे

आफ़ताब आरिफ़

यास है हसरत है ग़म है और शब-ए-दीजूर है

अफ़सर मेरठी

उन से हर हाल में तुम सिलसिला-जुम्बाँ रखना

अफ़सर माहपुरी

सरिश्क-ए-ग़म की रवानी थमी है मुश्किल से

अफ़सर माहपुरी

मेरे लिए साहिल का नज़ारा भी बहुत है

अफ़सर माहपुरी

मुझे गुम-शुदा दिल का ग़म है तो ये है

अफ़सर इलाहाबादी

हमारा कोह-ए-ग़म क्या संग-ए-ख़ारा है जो कट जाता

अफ़सर इलाहाबादी

न हो या रब ऐसी तबीअत किसी की

अफ़सर इलाहाबादी

फ़लक उन से जो बढ़ कर बद-चलन होता तो क्या होता

अफ़सर इलाहाबादी

तिश्नगी बाक़ी रहे दीवानगी बाक़ी रहे

अफ़रोज़ तालिब

पल-दो-पल

अफ़रोज़ आलम

यूँ ख़बर किसे थी मेरी तिरी मुख़बिरी से पहले

अफ़रोज़ आलम

तू मेरी नींदें तलाशता है यही बहुत है

अफ़रोज़ आलम

ऐ दोस्त तिरी बात सहर-ख़ेज़ बहुत है

अफ़रोज़ आलम

मुझ को इक अर्सा-ए-दिल-गीर में रक्खा गया था

अफ़ीफ़ सिराज

आप ने आज ये महफ़िल जो सजाई हुई है

अफ़ीफ़ सिराज

खिड़की अंधी हो चुकी है

आदिल मंसूरी

फ़ैज़

आदिल मंसूरी

उसी एक फ़र्द के वास्ते मिरे दिल में दर्द है किस लिए

अदीम हाशमी

रख़्त-ए-सफ़र यूँही तो न बेकार ले चलो

अदीम हाशमी

लोगों के दर्द अपनी पशेमानियाँ मिलीं

अदीम हाशमी

कुछ हिज्र के मौसम ने सताया नहीं इतना

अदीम हाशमी

हम बहर-ए-हाल दिल ओ जाँ से तुम्हारे होते

अदीम हाशमी

ग़म है वहीं प ग़म का सहारा गुज़र गया

अदीम हाशमी

दर्द होते हैं कई दिल में छुपाने के लिए

अदीम हाशमी

बड़ा वीरान मौसम है कभी मिलने चले आओ

अदीम हाशमी

मोहब्बत की सज़ा पाई बहुत है

अदील ज़ैदी

नग़्मा-ए-इश्क़-ए-बुताँ और ज़रा आहिस्ता

अदीब सहारनपुरी

मिरे शौक़-ए-जुस्तुजू का किसे ए'तिबार होता

अदीब सहारनपुरी

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