शोक Poetry (page 148)

खो के देखा था पा के देख लिया

अबु मोहम्मद सहर

काली ग़ज़ल सुनो न सुहानी ग़ज़ल सुनो

अबु मोहम्मद सहर

काम हर ज़ख़्म ने मरहम का किया हो जैसे

अबु मोहम्मद सहर

इश्क़ की सई-ए-बद-अंजाम से डर भी न सके

अबु मोहम्मद सहर

बस्तियाँ लुटती हैं ख़्वाबों के नगर जलते हैं

अबु मोहम्मद सहर

साथ मेरे तेरे जो दुख था सो प्यारे ऐश था

आबरू शाह मुबारक

तुम्हारे लोग कहते हैं कमर है

आबरू शाह मुबारक

शौक़ बढ़ता है मिरे दिल का दिल-अफ़गारों के बीच

आबरू शाह मुबारक

निगह तेरी का इक ज़ख़्मी न तन्हा दिल हमारा है

आबरू शाह मुबारक

मत ग़ज़ब कर छोड़ दे ग़ुस्सा सजन

आबरू शाह मुबारक

मगर तुम सीं हुआ है आश्ना दिल

आबरू शाह मुबारक

क्यूँ बंद सब खुले हैं क्यूँ चीर अटपटा है

आबरू शाह मुबारक

गुनाहगारों की उज़्र-ख़्वाही हमारे साहिब क़ुबूल कीजे

आबरू शाह मुबारक

बहार आई गली की तरह दिल खोल

आबरू शाह मुबारक

न पूछो जान पर क्या कुछ गुज़रती है ग़म-ए-दिल से

अबरार शाहजहाँपुरी

कुछ है ख़बर फ़रिश्तों के जलते हैं पर कहाँ

अबरार शाहजहाँपुरी

यक़ीन है कि गुमाँ है मुझे नहीं मालूम

अबरार अहमद

राह दुश्वार भी है बे-सर-ओ-सामानी भी

अबरार अहमद

कुछ काम नहीं है यहाँ वहशत के बराबर

अबरार अहमद

हमें ख़बर नहीं कुछ कौन है कहाँ कोई है

अबरार अहमद

हैराँ नहीं हैं हम कि परेशाँ नहीं हैं हम

अब्र अहसनी गनौरी

न जाने रब्त-ए-मसर्रत है किस क़दर ग़म से

आबिद नामी

सिर्फ़ कर्ब-ए-अना दिया है मुझे

आबिद मुनावरी

मुक़द्दर में साहिल कहाँ है मियाँ

आबिद मुनावरी

लाला-ज़ारों में ज़र्द फूल हूँ मैं

आबिद मुनावरी

ख़ुद सवाल आप ही जवाब हूँ मैं

आबिद मुनावरी

जब आसमान पर मह-ओ-अख़्तर पलट कर आए

आबिद मुनावरी

फ़लक से कैसे मिरा ग़म दिखाई देगा तुझे

आबिद मलिक

ज़मीं से चल के तो पहुँचा हूँ आसमाँ तक मैं

आबिद हशरी

श्याम गोकुल न जाना कि राधा का जी अब न बंसी की तानों पे लहराएगा

आबिद हशरी

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