शोक Poetry (page 20)

एक बुज़ुर्ग शायर परिंदे का तजरबा

ताबिश कमाल

ज़ेर-ए-लब रहा नाला दर्द की दवा हो कर

ताबिश देहलवी

'ताबिश' हवस-ए-लज़्ज़त-ए-आज़ार कहाँ तक

ताबिश देहलवी

सब ग़म कहें जिसे कि तमन्ना कहें जिसे

ताबिश देहलवी

पाबंदी-ए-हुदूद से बेगाना चाहिए

ताबिश देहलवी

हर इक दाग़-ए-दिल शम्अ' साँ देखता हूँ

ताबिश देहलवी

एक जल्वा ब-सद अंदाज़-ए-नज़र देख लिया

ताबिश देहलवी

धूमें मचाएँ सब्ज़ा रौंदें फूलों को पामाल करें

ताबिश देहलवी

बंद-ए-ग़म मुश्किल से मुश्किल-तर खुला

ताबिश देहलवी

अज़ाब टूटे दिलों को हर इक नफ़स गुज़रा

ताबिश देहलवी

तुम्हीं बताओ पुकारा है बार बार किसे

ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ

तुम्हीं बताओ पुकारा है बार बार किसे

ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ

सवाद-ए-ग़म में कहीं गोशा-ए-अमाँ न मिला

ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ

शरह-ए-जाँ-सोज़-ए-ग़म-ए-अर्ज़-ए-वफ़ा क्या करते

ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ

लुत्फ़ का रब्त है कोई न जफ़ा का रिश्ता

ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ

जल्वा पाबंद-ए-नज़र भी है नज़र-साज़ भी है

ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ

हर सितम लुत्फ़ है दिल ख़ूगर-ए-आज़ार कहाँ

ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ

एक तुम ही नहीं दुनिया में जफ़ाकार बहुत

ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ

न थे आशिक़ किसी बे-दाद पर हम जब तलक 'ताबाँ'

ताबाँ अब्दुल हई

मैं हो के तिरे ग़म से नाशाद बहुत रोया

ताबाँ अब्दुल हई

देख क़ासिद को मिरे यार ने पूछा 'ताबाँ'

ताबाँ अब्दुल हई

आता नहीं वो यार-ए-सितमगर तो क्या हुआ

ताबाँ अब्दुल हई

तुम्हारे हिज्र में रहता है हम को ग़म मियाँ-साहिब

ताबाँ अब्दुल हई

तिरे मिज़्गाँ की फ़ौजें बाँध कर सफ़ जब हुईं ख़ड़ियाँ

ताबाँ अब्दुल हई

साक़ी हो और चमन हो मीना हो और हम हों

ताबाँ अब्दुल हई

नहीं कोई दोस्त अपना यार अपना मेहरबाँ अपना

ताबाँ अब्दुल हई

मुझे ऐश ओ इशरत की क़ुदरत नहीं है

ताबाँ अब्दुल हई

मैं हो के तिरे ग़म से नाशाद बहुत रोया

ताबाँ अब्दुल हई

लड़का जो ख़ूब-रू है सो मुझ से बचा नहीं

ताबाँ अब्दुल हई

क्या करें क्यूँ-कर रहें दुनिया में यारो हम ख़ुशी

ताबाँ अब्दुल हई

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