शोक Poetry (page 56)

आप से क्या दोस्ती होने लगी

साहिर होशियारपुरी

ग़म-ए-मौजूद ग़लत और ग़म-ए-फ़र्दा बातिल

साहिर देहल्वी

जुनूँ के जोश में जिस ने मोहब्बत को हुनर जाना

साहिर देहल्वी

चश्म-ए-मस्त-ए-साक़ी से दिल हुआ ख़राब-आबाद

साहिर देहल्वी

आईना मेरा बदल कर ले गया

साहिल अहमद

थपकियाँ दे के तिरे ग़म को सुलाया हम ने

साहिबा शहरयार

इक बर्फ़ का दरिया अंदर था

साहिबा शहरयार

अब के बारिश को भी तो आने दे

साहिबा शहरयार

आ जा अँधेरी रातें तन्हा बिता चुका हूँ

सहबा अख़्तर

तुम्हारे ग़म को ग़म-ए-जाँ बना लिया मैं ने

सहर महमूद

जो हैं हवस के पुजारी वो माल-ओ-ज़र के लिए

सहर महमूद

हर घड़ी मुझ को बे-क़रार न कर

सहर महमूद

है ये सूरत ग़म के बस इज़हार की

सहर महमूद

दर्द की सूरत में वो उम्दा सा तोहफ़ा दे गया

सहर महमूद

चमन में रह के भी क्यूँ दिल की वीरानी नहीं जाती

सहर महमूद

तिरी आरज़ू से भी क्यूँ नहीं ग़म-ए-ज़िंदगी में कोई कमी

सहर अंसारी

क़ाबील का साया

सहर अंसारी

हिसाब-ए-शब

सहर अंसारी

अलाव

सहर अंसारी

विसाल-ओ-हिज्र से वाबस्ता तोहमतें भी गईं

सहर अंसारी

न किसी से करम की उम्मीद रखें न किसी के सितम का ख़याल करें

सहर अंसारी

महसूस क्यूँ न हो मुझे बेगानगी बहुत

सहर अंसारी

कहीं वो चेहरा-ए-ज़ेबा नज़र नहीं आया

सहर अंसारी

हम ने आदाब-ए-ग़म का पास किया

सहर अंसारी

हम अहल-ए-ज़र्फ़ कि ग़म-ख़ाना-ए-हुनर में रहे

सहर अंसारी

हवस ओ वफ़ा की सियासतों में भी कामयाब नहीं रहा

सहर अंसारी

हाथ आ सका है सिलसिला-ए-जिस्म-ओ-जाँ कहाँ

सहर अंसारी

दिल पे गर चोट न लगती तो न इशरत थी न ग़म

सहाब क़ज़लबाश

इश्क़ क्या है ख़ुद-फ़रामोशी मुसलसल इज़्तिराब

सग़ीर अहमद सग़ीर अहसनी

क्यूँ तू ने वा किया था बंद-ए-क़बा चमन में

सग़ीर अली मुरव्वत

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