शोक Poetry (page 58)

धूप में ग़म की मिरे साथ जो आया होगा

साग़र आज़मी

ऐसी नहीं है बात कि क़द अपने घट गए

साग़र आज़मी

वो हसरत-ए-बहार न तूफ़ान-ए-ज़िंदगी

सफ़िया शमीम

शम-ए-हसरत जला गए आँसू

सफ़िया शमीम

वो आलम है कि मुँह फेरे हुए आलम निकलता है

सफ़ी लखनवी

वो आलम है कि मुँह फेरे हुए आलम निकलता है

सफ़ी लखनवी

तराना-ए-क़ौमी

सफ़ीर काकोरवी

शहर के लोग जिसे तेरी सितम-ज़ाई कहें

सफ़दर सलीम सियाल

इस से पहले कि किसी घाट उतारे जाते

सफ़दर सलीम सियाल

दुरुस्त है कि मिरा हाल अब ज़ुबूँ भी नहीं

सफ़दर मीर

चार सू हसरतों की पहनाई

सफ़दर ख़ुर्शीद

सहरा में ज़र्रा क़तरा समुंदर में जा मिला

सईदुल ज़फर चुग़ताई

मुसव्विर अपने तसव्वुर का ढूँढता है दवाम

सईदुल ज़फर चुग़ताई

तुम नहीं ग़म नहीं शराब नहीं

सईद राही

चेहरा चेहरा ग़म है अपने मंज़र में

सईद क़ैस

रोज़ हवा में उड़ने की फ़रमाइश है

सईद क़ैस

शिकस्त मान के तस्ख़ीर कर लिया है मुझे

सईद ख़ान

ख़ुदी मेरा पता देती है अब भी

सईद आरिफ़ी

कुछ हक़ीक़त तो हुआ करती थी इंसानों में

सईद अहमद अख़्तर

ज़ुल्फ़ तेरी हुई कमंद मुझे

सदरुद्दीन मोहम्मद फ़ाएज़

यूँ तो हर एक शख़्स ही तालिब समर का है

सादिक़ नसीम

शिकस्त-ए-आबला-ए-दिल में नग़्मगी है बहुत

सादिक़ नसीम

नज़र नज़र से वो कलियाँ खिला खिला भी गया

सादिक़ नसीम

जब भी तिरी क़ुर्बत के कुछ इम्काँ नज़र आए

सादिक़ नसीम

ज़िंदगी ग़म के अंधेरों में सँवरने से रही

सादिक़ इंदौरी

दिल को पैहम दर्द से दो-चार रहने दीजिए

सादिक़ इंदौरी

रास्ते फैले हुए जितने भी थे पत्थर के थे

सदफ़ जाफ़री

मिलते नहीं हैं जब हमें ग़म-ख़्वार एक दो

सदफ़ जाफ़री

लफ़्ज़ों को सजा कर जो कहानी लिखना

सदफ़ जाफ़री

तबीअत रफ़्ता रफ़्ता ख़ूगर-ए-ग़म होती जाती है

सदा अम्बालवी

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