शोक Poetry (page 94)

वो ख़ुद अपना दामन बढ़ाने लगे

फ़ारूक़ बख़्शी

रेज़ा रेज़ा सा भला मुझ में बिखरता क्या हे

फ़ारूक़ बख़्शी

मैं मो'तबर हूँ इश्क़ मिरा मो'तबर नहीं

फ़ारूक़ अंजुम

ख़ाली नहीं है कोई यहाँ पर अज़ाब से

फ़ारूक़ अंजुम

दिल नहीं मिलने का फिर मेरा सितमगर टूट कर

फ़रोग़ हैदराबादी

भली क्यूँ लगे हम को ख़ुशियों की दस्तक

फरीहा नक़वी

उसे भूलने का सितम कर रहे हैं

फरीहा नक़वी

लाख दिल ने पुकारना चाहा

फरीहा नक़वी

यही है दौर-ए-ग़म-ए-आशिक़ी तो क्या होगा

फ़ारिग़ बुख़ारी

यही है दौर-ए-ग़म-ए-आशिक़ी तो क्या होगा

फ़ारिग़ बुख़ारी

मसीह-ए-वक़्त सही हम को उस से क्या लेना

फ़ारिग़ बुख़ारी

क्या अदू क्या दोस्त सब को भा गईं रुस्वाइयाँ

फ़ारिग़ बुख़ारी

दो घड़ी बैठे थे ज़ुल्फ़-ए-अम्बरीं की छाँव में

फ़ारिग़ बुख़ारी

शुऊर-ओ-फ़िक्र की तज्दीद का गुमाँ तो हुआ

फ़रहत क़ादरी

जितने लोग नज़र आते हैं सब के सब बेगाने हैं

फ़रहत क़ादरी

जब हर नज़र हो ख़ुद ही तजल्ली-नुमा-ए-ग़म

फ़रहत क़ादरी

न दौलत की तलब थी और न दौलत चाहिए है

फ़रहत नदीम हुमायूँ

कोई अहद-ए-वफ़ा भूला हुआ हूँ

फ़रहत नदीम हुमायूँ

हस्ती का राज़ क्या है ग़म-ए-हस्त-ओ-बूद है

फ़रहत कानपुरी

तिरा जल्वा शाम-ओ-सहर देखते हैं

फ़रहत कानपुरी

जो कुछ भी है नज़र में सो वहम-ए-नुमूद है

फ़रहत कानपुरी

इक ख़लिश सी है मुझे तक़दीर से

फ़रहत कानपुरी

पहले तो ज़रा सा हट के देखा

फ़रहत एहसास

हम अपने आप को अपने से कम भी करते रहते हैं

फ़रहत एहसास

तुम्हारे ख़्वाब मिरे साथ साथ चलते हैं

फ़रहत अब्बास शाह

ज़िक्र-ए-शब के सईद हो गए क्या

फ़रहत अब्बास

ख़याल आतिशीं ख़्वाबीदा सूरतें दी हैं

फ़रहत अब्बास

वो क़ाफ़िला जो रह-ए-शाएरी में कम उतरा

फ़रहान सालिम

खो बैठी है सारे ख़द-ओ-ख़ाल अपनी ये दुनिया

फ़रहान सालिम

अक्स कुछ न बदलेगा आइनों को धोने से

फ़रहान सालिम

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