घर Poetry (page 130)

जब आसमान पर मह-ओ-अख़्तर पलट कर आए

आबिद मुनावरी

बे-तमन्ना हूँ ख़स्ता-जान हूँ मैं

आबिद मुनावरी

और किस का घर कुशादा है कहाँ ठहरेगी रात

आबिद मुनावरी

जिन्हें था फ़ख़्र नवाब-ओ-नजीब होते हैं

आबिद काज़मी

श्याम गोकुल न जाना कि राधा का जी अब न बंसी की तानों पे लहराएगा

आबिद हशरी

अजनबी

आबिद आलमी

तुम ने जब घर में अंधेरों को बुला रक्खा है

आबिद आलमी

तुम ने जब घर में अँधेरों को बुला रक्खा है

आबिद आलमी

मिरा बदन है मगर मुझ से अजनबी है अभी

आबिद आलमी

क्या ख़बर कब से प्यासा था सहरा

आबिद आलमी

जब से अल्फ़ाज़ के जंगल में घिरा है कोई

आबिद आलमी

जब भी कमरे में कुछ हवा आई

आबिद आलमी

सफ़र के बाद भी ज़ौक़-ए-सफ़र न रह जाए

अभिषेक शुक्ला

सुर्ख़ सहर से है तो बस इतना सा गिला हम लोगों का

अभिषेक शुक्ला

सफ़र के बा'द भी ज़ौक़-ए-सफ़र न रह जाए

अभिषेक शुक्ला

चलते हुए मुझ में कहीं ठहरा हुआ तू है

अभिषेक शुक्ला

छोड़ उन को न जाने किधर मैं गया

अभिषेक कुमार अम्बर

ताज़ा-दम जवानी रख

अब्दुस्समद ’तपिश’

गरचे नेज़ों पे सर है

अब्दुस्समद ’तपिश’

एक भी चैन का बिस्तर नहीं होने देता

अब्दुस्समद ’तपिश’

दिल में लिए औहाम को इस घर से उठा मैं

अब्दुर्राहमान वासिफ़

ज़ुल्मतें वहशत-ए-फ़र्दा से निढाल

अब्दुर रऊफ़ उरूज

जादा-ए-मय पे गुज़र ख़्वाबों का

अब्दुर रऊफ़ उरूज

वो सो रहा है ख़ुदा दूर आसमानों में

अब्दुर्रहीम नश्तर

इन काली सड़कों प अक्सर ध्यान आया

अब्दुर्रहीम नश्तर

आओ आज हम दोनों अपना अपना घर चुन लें

अब्दुल्लाह कमाल

उस की जाम-ए-जम आँखें शीशा-ए-बदन मेरा

अब्दुल्लाह कमाल

फिर नई हिजरत कोई दरपेश है

अब्दुल्लाह जावेद

हर इक रस्ते पे चल कर सोचते हैं

अब्दुल्लाह जावेद

आप के जाते ही हम को लग गई आवारगी

अब्दुल्लाह जावेद

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