घर Poetry (page 131)

समुंदर पार आ बैठे मगर क्या

अब्दुल्लाह जावेद

फूल के लायक़ फ़ज़ा रखनी ही थी

अब्दुल्लाह जावेद

कभी प्यारा कोई मंज़र लगेगा

अब्दुल्लाह जावेद

जो गुज़रता है गुज़र जाए जी

अब्दुल्लाह जावेद

जानिब-ए-दर देखना अच्छा नहीं

अब्दुल्लाह जावेद

चाँदनी का रक़्स दरिया पर नहीं देखा गया

अब्दुल्लाह जावेद

चमका जो चाँद रात का चेहरा निखर गया

अब्दुल्लाह जावेद

इस तरह रुख़ फेरते हो सुनते ही बोसे की बात

अब्दुल वहाब यकरू

अगर नहीं क़स्द ऐ ज़ालिम मिरे दिल के सताने का

अब्दुल वहाब यकरू

क्या क्या सुपुर्द-ए-ख़ाक हुए नामवर तमाम

अब्दुल रहमान ख़ान वासिफ़ी बहराईची

नहीं सुनता नहीं आता नहीं बस मेरा चलता है

अब्दुल रहमान एहसान देहलवी

जान अपनी चली जाए हे जाए से कसू की

अब्दुल रहमान एहसान देहलवी

गली से तिरी जो कि ऐ जान निकला

अब्दुल रहमान एहसान देहलवी

मैं शब-ए-हिज्र क्या करूँ तन्हा

अब्दुल मतीन नियाज़

इंतिशार-ओ-ख़ौफ़ हर इक सर में है

अब्दुल मतीन नियाज़

मैं पहुँचा अपनी मंज़िल तक मगर आहिस्ता आहिस्ता

अब्दुल मन्नान तरज़ी

ख़्वाब की बस्ती में अफ़्साने का घर

अब्दुल मन्नान तरज़ी

मेरे घर से उस की यादों के मकीं जाते नहीं

अब्दुल मन्नान समदी

जब कोई मेहरबान होता है

अब्दुल मजीद ख़ाँ मजीद

मुंक़लिब सूरत-ए-हालात भी हो जाती है

अब्दुल हमीद अदम

मतलब मुआ'मलात का कुछ पा गया हूँ मैं

अब्दुल हमीद अदम

हँस के बोला करो बुलाया करो

अब्दुल हमीद अदम

फ़क़ीर किस दर्जा शादमाँ थे हुज़ूर को कुछ तो याद होगा

अब्दुल हमीद अदम

लौट गए सब सोच के घर में कोई नहीं है

अब्दुल हमीद

उसे देख कर अपना महबूब प्यारा बहुत याद आया

अब्दुल हमीद

साए फैल गए खेतों पर कैसा मौसम होने लगा

अब्दुल हमीद

कितनी महबूब थी ज़िंदगी कुछ नहीं कुछ नहीं

अब्दुल हमीद

किसी दश्त ओ दर से गुज़रना भी क्या

अब्दुल हमीद

एक ख़ुदा पर तकिया कर के बैठ गए हैं

अब्दुल हमीद

सज्दे के हर निशाँ पे है ख़ूँ सा जमा हुआ

अब्दुल हफ़ीज़ नईमी

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