घर Poetry (page 129)

क़फ़स से छुटने पे शाद थे हम कि लज़्ज़त-ए-ज़िंदगी मिलेगी

अबुल मुजाहिद ज़ाहिद

नई सुब्ह चाहते हैं नई शाम चाहते हैं

अबुल मुजाहिद ज़ाहिद

गया तो हुस्न न दीवार में न दर में था

अबुल मुजाहिद ज़ाहिद

वो कश्ती से देते थे मंज़र की दाद

अबुल हसनात हक़्क़ी

ये इक और हम ने क़रीना किया

अबुल हसनात हक़्क़ी

ये इक और हम ने क़रीना किया

अबुल हसनात हक़्क़ी

सब इक न इक सराब के चक्कर में रह गए

अबु मोहम्मद सहर

जंगल के बीच वहशत घर में जफ़ा ओ कुल्फ़त

आबरू शाह मुबारक

ज़िंदगानी सराब की सी तरह

आबरू शाह मुबारक

ये सब्ज़ा और ये आब-ए-रवाँ और अब्र ये गहरा

आबरू शाह मुबारक

पलंग कूँ छोड़ ख़ाली गोद सीं जब उठ गया मीता

आबरू शाह मुबारक

नहीं घर में फ़लक के दिल-कुशाई

आबरू शाह मुबारक

आशिक़ बिपत के मारे रोते हुए जिधर जाँ

आबरू शाह मुबारक

कुछ है ख़बर फ़रिश्तों के जलते हैं पर कहाँ

अबरार शाहजहाँपुरी

हर इक इंसान के आमाल भी यकसाँ नहीं होते

अबरार किरतपुरी

नुमायाँ जब वो अपने ज़ेहन की तस्वीर करता है

अबरार किरतपुरी

तन्हा उदास शब के सिवा कोई भी न था

अबरार आज़मी

धूप चमकी रात की तस्वीर पीली हो गई

अबरार आज़मी

ढंग के एक ठिकाने के लिए

अबरार अहमद

तुम जो आते हो

अबरार अहमद

मेरे पास क्या कुछ नहीं

अबरार अहमद

हम कि इक भेस लिए फिरते हैं

अबरार अहमद

आँखें तरस गई हैं

अबरार अहमद

ये रह-ए-इश्क़ है इस राह पे गर जाएगा तू

अबरार अहमद

जो भी यकजा है बिखरता नज़र आता है मुझे

अबरार अहमद

हम ने रक्खा था जिसे अपनी कहानी में कहीं

अबरार अहमद

हमें ख़बर नहीं कुछ कौन है कहाँ कोई है

अबरार अहमद

गुरेज़ाँ था मगर ऐसा नहीं था

अबरार अहमद

इक फ़रामोश कहानी में रहा

अबरार अहमद

न घर सुकून-कदा है न कारख़ाना-ए-इश्क़

आबिद वदूद

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