घर Poetry (page 14)

तिरी नज़र में तिरे मा-सिवा नहीं होगा

वक़ार वासिक़ी

अपने अंदर उतर रहा हूँ मैं

वक़ार वासिक़ी

गई है शाम अभी ज़ख़्म ज़ख़्म कर के मुझे

वक़ार मानवी

ज़िंदगी इतनी बे-मज़ा क्यूँ है

वक़ार हिल्म सय्यद नगलवी

ज़हर के घूँट पी रहे हैं हम

वक़ार हिल्म सय्यद नगलवी

कुएँ जो पानी की बिन प्यास चाह रखते हैं

वक़ार हिल्म सय्यद नगलवी

मौसम को भी 'वक़ार' बदल जाना चाहिए

वक़ार फ़ातमी

जो सोचते रहे वो कर गुज़रना चाहते हैं

वक़ार फ़ातमी

नज़र मिलते ही बरसे अश्क-ए-ख़ूँ क्यूँ दीदा-ए-तर से

वक़ार बिजनोरी

ग़म-ए-मोहब्बत है कार-फ़रमा दुआ से पहले असर से पहले

वक़ार बिजनोरी

हम न कहते थे शाइरी है वबाल

वामिक़ जौनपुरी

देहली

वामिक़ जौनपुरी

भूका बंगाल

वामिक़ जौनपुरी

वो तन्हा मेरे ही दरपय नहीं है

वामिक़ जौनपुरी

शमएँ रौशन हैं आबगीनों में

वामिक़ जौनपुरी

जो दश्त ख़्वाबों में अक्सर दिखाई देता है

वामिक़ जौनपुरी

इस ख़ानुमाँ-ख़राब को भी दे मियाँ बता

वलीउल्लाह मुहिब

यूँ घर से मोहब्बत के क्या भाग चले जाना

वलीउल्लाह मुहिब

वहीं जी उठते हैं मुर्दे ये क्या ठोकर से छूना है

वलीउल्लाह मुहिब

साथ ग़ैरों के है सदा गट-पट

वलीउल्लाह मुहिब

पहचाने तू हर-दम वही हर आन वही है

वलीउल्लाह मुहिब

लाला-रू तुम ग़ैर के पाले पड़े

वलीउल्लाह मुहिब

हो जिस क़दर कि तुझ से ऐ पुर-जफ़ा जफ़ा कर

वलीउल्लाह मुहिब

अश्क-बारी का मिरी आँखों ने ये बाँधा है झाड़

वलीउल्लाह मुहिब

वो क्या दिन थे जो क़ातिल-बिन दिल-ए-रंजूर रो देता

वली उज़लत

गर्द-बाद अफ़्सोस का जंगल से है पैदा हनूज़

वली उज़लत

अरे उल्टे ज़माने मुझ पे क्या सीधा सितम लाया

वली उज़लत

मत ग़ुस्से के शो'ले सूँ जलते कूँ जलाती जा

वली मोहम्मद वली

किया मुझ इश्क़ ने ज़ालिम कूँ आब आहिस्ता आहिस्ता

वली मोहम्मद वली

अगर गुलशन तरफ़ वो नौ-ख़त-ए-रंगीं-अदा निकले

वली मोहम्मद वली

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