घर Poetry (page 16)

क्यूँ तिरी क़ंद-लबी ख़ुश-सुख़नी याद आई

वहीद अख़्तर

इक दश्त-ए-बे-अमाँ का सफ़र है चले-चलो

वहीद अख़्तर

आँख जो नम हो वही दीदा-ए-तर मेरा है

वहीद अख़्तर

पचासी साल नीचे गिर गए

वहीद अहमद

खिलौने

वहीद अहमद

आबाद वीरानियाँ

वहीद अहमद

कई भयानक काली रातों के अँधियारे में

वहाब दानिश

हम ने घटता-बढ़ता साया पग-पग चल कर देखा है

विश्वनाथ दर्द

हैं किस लिए उदास कोई पूछता नहीं

विश्वनाथ दर्द

दीवार-ओ-दर सा चाहिए दीवार-ओ-दर मुझे

विशाल खुल्लर

दिल भी अजीब ख़ाना-ए-वहदत-पसंद था

विपुल कुमार

इस ख़राबी की कोई हद है कि मेरे घर से

विपुल कुमार

या तिरी आरज़ू सा हो जाऊँ

विनीत आश्ना

इक-दूजे में भी तो रहा जा सकता है

विनीत आश्ना

ज़र्रों की बातों में आने वाला था

विकास शर्मा राज़

हाथ पर हाथ रख के क्यूँ बैठूँ

विकास शर्मा राज़

रही है यूँ ही नदामत मुझे मुक़द्दर से

विजय शर्मा अर्श

नम आँखों में क्या कर लेगा ग़ुस्सा देखेंगे

विजय शर्मा अर्श

जिस भी जगह देखी उस ने अपनी तस्वीर हटा ली थी

विजय शर्मा अर्श

बीते वक़्त का चेहरा ढूँढता रहता है

विजय शर्मा अर्श

उठ रहा है दम-ब-दम डर का धुआँ

वसाफ़ बासित

धूप शजर को गीत सुनाए आती है

वसाफ़ बासित

उजड़ के घर से सर-ए-राह आ के बैठे हैं

वारिस किरमानी

फैला न यूँ ख़ुलूस की चादर मिरे लिए

वली मदनी

बना कर ख़ुद को जिस ने इक भला इंसान रक्खा है

वली मदनी

तमाम रात वो जागा किसी के वा'दे पर

वफ़ा मलिकपुरी

नई सहर है ये लोगो नया सवेरा है

वफ़ा मलिकपुरी

अक्सर मिरी ज़मीं ने मिरे इम्तिहाँ लिए

उषा भदोरिया

सौ बातों की बात है प्यारे वो जो ज़ात में होती है

उरूज ज़ेहरा ज़ैदी

ज़िंदाबाद ऐ दश्त के मंज़र ज़िंदाबाद

उनवान चिश्ती

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