घर Poetry (page 17)

सारी दुनिया में दाना है अपने घर में कुछ भी नहीं

उनवान चिश्ती

रात कई आवारा सपने आँखों में लहराए थे

उनवान चिश्ती

तिरी तलाश में जाने कहाँ भटक जाऊँ

उम्मीद फ़ाज़ली

मक़्तल-ए-जाँ से कि ज़िंदाँ से कि घर से निकले

उम्मीद फ़ाज़ली

गर क़यामत ये नहीं है तो क़यामत क्या है

उम्मीद फ़ाज़ली

ज़ेहन-ओ-दिल में कुछ न कुछ रिश्ता भी था

उम्मीद फ़ाज़ली

तुम हो जो कुछ कहाँ छुपाओगे

उम्मीद फ़ाज़ली

तुम हो जो कुछ कहाँ छुपाओगे

उम्मीद फ़ाज़ली

मक़्तल-ए-जाँ से कि ज़िंदाँ से कि घर से निकले

उम्मीद फ़ाज़ली

इक ऐसा मरहला-ए-रह-गुज़र भी आता है

उम्मीद फ़ाज़ली

मिरे मालिक मुझे इस ख़ाक से बे-घर न करना

उमर फ़ारूक़

हमें तो टूटी हुई कश्तियाँ नहीं दिखतीं

उमर फ़ारूक़

ज़ेहन के कैनवस को फैला कर

उमर फ़रहत

उठा ये शोर वहीं से सदाओं का क्यूँ-कर

उमर अंसारी

हर इक का दर्द उसी आशुफ़्ता-सर में तन्हा था

उमर अंसारी

मिरी भँवों के ऐन दरमियान बन गया

उमैर नजमी

खेल दोनों का चले तीन का दाना न पड़े

उमैर नजमी

एक तारीख़ मुक़र्रर पे तो हर माह मिले

उमैर नजमी

ग़ज़ल का सिलसिला था याद होगा

तुफ़ैल चतुर्वेदी

ताइर-ए-ख़ुश-रंग को बे-बाल-ओ-पर देखेगा कौन

तुफ़ैल अहमद मदनी

बे-क़रारी सी बे-क़रारी है

तौसीफ ताबिश

आइने के रू-ब-रू इक आइना रखता हूँ मैं

तौसीफ ताबिश

चमन में बर्क़ कभी आशियाँ से दूर नहीं

तिश्ना बरेलवी

सुनो कवी तौसीफ़ तबस्सुम इस दुख से क्या पाओगे

तौसीफ़ तबस्सुम

मेरी सूरत साया-ए-दीवार-ओ-दर में कौन है

तौसीफ़ तबस्सुम

मेरी सूरत साया-ए-दीवार-ओ-दर में कौन है

तौसीफ़ तबस्सुम

मरते मरते रौशनी का ख़्वाब तो पूरा हुआ

तौसीफ़ तबस्सुम

बजा कि दरपय-ए-आज़ार चश्म-ए-तर है बहुत

तौसीफ़ तबस्सुम

रूठ कर आँख के अंदर से निकल जाते हैं

तौक़ीर तक़ी

याद और ग़म की रिवायात से निकला हुआ है

तौक़ीर तक़ी

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