घर Poetry (page 18)

रूठ कर आँख के अंदर से निकल जाते हैं

तौक़ीर तक़ी

एक ख़्वाब

तौक़ीर अहमद

रुख़ से नक़ाब उन के जो हटती चली गई

तौक़ीर अहमद

अपने घर पर बुला लिया उस ने

तौक़ीर अहमद

रेशम रेशम तितली देखूँ ख़्वाब-नगर की वादी में

ताैफ़ीक़ साग़र

पर्वाज़ का था शौक़ मुझे आसमान तक

ताैफ़ीक़ साग़र

फ़क़ीरों का चलन यूँ जिस्म के अंदर महकता है

ताैफ़ीक़ साग़र

अक्स-ए-ज़ंजीर पे जाँ देने के पहलू दूँगा

तसनीम फ़ारूक़ी

ये कैसी सुब्ह हुई कैसा ये सवेरा है

तस्लीम इलाही ज़ुल्फ़ी

ख़्वाब पहले ले गया फिर रत-जगा भी ले गया

तस्लीम इलाही ज़ुल्फ़ी

अब ख़ाना-ब-दोशों का पता है न ख़बर है

तस्लीम इलाही ज़ुल्फ़ी

कुछ दिन से अजब बे-कली घेरे है तसव्वुर

तस्लीम अहमद तसव्वुर

मिल जाए अमाँ दुनिया में पल भर नहीं लगता

तस्लीम अहमद तसव्वुर

तू क्यूँ पास से उठ चला बैठे बैठे

मीर तस्कीन देहलवी

रहने वालों को तिरे कूचे के ये क्या हो गया

मीर तस्कीन देहलवी

ज़ेहन में हो कोई मंज़िल तो नज़र में ले जाऊँ

तसव्वुर ज़ैदी

अपने दम से गुज़र औक़ात नहीं करता मैं

तरकश प्रदीप

ये रोज़-ओ-शब की मसाफ़त ये आना जाना मिरा

तारिक़ क़मर

ये आरज़ू थी उसे आइना बनाते हम

तारिक़ क़मर

ख़ुश्क आँखों से कहाँ तय ये मसाफ़त होगी

तारिक़ क़मर

ज़मीन इतनी नहीं है कि पाँव रख पाएँ

तारिक़ नईम

वो ख़ुद गया है उस का असर तो नहीं गया

तारिक़ नईम

फिर इस से क़ब्ल कि बार-ए-दिगर बनाया जाए

तारिक़ नईम

हवा का हुक्म भी अब के नज़र में रक्खा जाए

तारिक़ नईम

ऐसी तक़्सीम की सूरत निकल आई घर में

तारिक़ नईम

अगर कुछ भी मिरे घर से दम-ए-रुख़्सत निकलता है

तारिक़ नईम

ग़म की दीवार को मैं ज़ेर-ओ-ज़बर कर न सका

तारिक़ मतीन

अपने दुखों का हम ने तमाशा नहीं किया

तारिक़ मतीन

है किस का इंतिज़ार खुला घर का दर भी है

तारिक़ बट

भूली हुई राहों का सफ़र कैसा लगेगा

तारिक़ बट

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