घर Poetry (page 15)

सफ़र है ख़त्म मगर बे-घरी न जाएगी

वली आलम शाहीन

वहाँ हमारा कोई मुंतज़िर नहीं फिर भी

वाली आसी

हमारे शहर में अब हर तरफ़ वहशत बरसती है

वाली आसी

तुझ से बिछड़ के यूँ तो बहुत जी उदास है

वाली आसी

फिर वही रेग-ए-बयाबाँ का है मंज़र और हम

वाली आसी

मैं जब छोटा सा था काग़ज़ पे ये मंज़र बनाता था

वाली आसी

इश्क़ की राह में यूँ हद से गुज़र मत जाना

वाली आसी

दिन भर ग़मों की धूप में चलना पड़ा मुझे

वाली आसी

छतरी लगा के घर से निकलने लगे हैं हम

वाली आसी

ब-रंग-ए-नग़मा बिखर जाना चाहते हैं हम

वाली आसी

बहुत दिन से कोई मंज़र बनाना चाहते हैं हम

वाली आसी

आरज़ू ले के कोई घर से निकलते क्यूँ हो

वाली आसी

बुझा भी जाए कोई आ के आँधियों की तरह

वकील अख़्तर

ज़ोहरा सुहैल शम्स ख़ुर बद्र बहा तू कौन है

वाजिद अली शाह अख़्तर

क्या बताएँ उस के बिन कैसे ज़िंदगी कर ली

वजीह सानी

गिले शिकवे के दफ़्तर आ गए तुम

वजीह सानी

साए ने साए को सदा दी

वजद चुगताई

रात क़ातिल की गली हो जैसे

वजद चुगताई

लगाएँ आग ही दिल में कि कुछ उजाला हो

वजद चुगताई

दुनिया अपनी मंज़िल पहुँची तुम घर में बेज़ार पड़े

वजद चुगताई

देखने में ये काँच का घर है

वजद चुगताई

चाहतों की जो दिल को आदत है

वजद चुगताई

आप ही अपना मैं दुश्मन हो गया

वजद चुगताई

संग-ए-तिफ़्लाँ फ़िदा-ए-सर न हुआ

वहशत रज़ा अली कलकत्वी

याद आई न कभी बे-सर-ओ-सामानी में

वहीद अख़्तर

मस्जिद हो मदरसा हो कि मज्लिस कि मय-कदा

वहीद अख़्तर

बाम ओ दर ओ दीवार को ही घर नहीं कहते

वहीद अख़्तर

सफ़र ही बाद-ए-सफ़र है तो क्यूँ न घर जाऊँ

वहीद अख़्तर

रुख़्सत-ए-नुत्क़ ज़बानों को रिया क्या देगी

वहीद अख़्तर

रात भर ख़्वाब के दरिया में सवेरा देखा

वहीद अख़्तर

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