घर Poetry (page 13)

ये जल जाते हैं लब तक आह भी आने नहीं देते

वसीम मीनाई

कल साथ था कोई तो दर ओ बाम थे रौशन

वसीम मलिक

जो शख़्स मिरा दस्त-ए-हुनर काट रहा है

वसीम मलिक

फूल अपने वस्फ़ सुनते हैं उस ख़ुश-नसीब से

वसीम ख़ैराबादी

हम ने उस शोख़ की रानाई क़ामत देखी

वसीम ख़ैराबादी

वो मेरे घर नहीं आता मैं उस के घर नहीं जाता

वसीम बरेलवी

कुछ है कि जो घर दे नहीं पाता है किसी को

वसीम बरेलवी

हमारे घर का पता पूछने से क्या हासिल

वसीम बरेलवी

चराग़ घर का हो महफ़िल का हो कि मंदिर का

वसीम बरेलवी

ख़्वाब नहीं देखा है

वसीम बरेलवी

वो मेरे घर नहीं आता मैं उस के घर नहीं जाता

वसीम बरेलवी

उसे समझने का कोई तो रास्ता निकले

वसीम बरेलवी

तुम्हें ग़मों का समझना अगर न आएगा

वसीम बरेलवी

तुम्हारी राह में मिट्टी के घर नहीं आते

वसीम बरेलवी

सभी का धूप से बचने को सर नहीं होता

वसीम बरेलवी

मुझे तो क़तरा ही होना बहुत सताता है

वसीम बरेलवी

मिली हवाओं में उड़ने की वो सज़ा यारो

वसीम बरेलवी

मेरे ग़म को जो अपना बताते रहे

वसीम बरेलवी

मैं ये नहीं कहता कि मिरा सर न मिलेगा

वसीम बरेलवी

मैं अपने ख़्वाब से बिछड़ा नज़र नहीं आता

वसीम बरेलवी

कितना दुश्वार था दुनिया ये हुनर आना भी

वसीम बरेलवी

खुल के मिलने का सलीक़ा आप को आता नहीं

वसीम बरेलवी

हम अपने आप को इक मसअला बना न सके

वसीम बरेलवी

हवेलियों में मिरी तर्बियत नहीं होती

वसीम बरेलवी

हादसों की ज़द पे हैं तो मुस्कुराना छोड़ दें

वसीम बरेलवी

दुख अपना अगर हम को बताना नहीं आता

वसीम बरेलवी

दुआ करो कि कोई प्यास नज़्र-ए-जाम न हो

वसीम बरेलवी

चलो हम ही पहल कर दें कि हम से बद-गुमाँ क्यूँ हो

वसीम बरेलवी

भला ग़मों से कहाँ हार जाने वाले थे

वसीम बरेलवी

अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है छुपाएँ कैसे

वसीम बरेलवी

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