घर Poetry (page 12)

'यगाना' वही फ़ातेह-ए-लखनऊ हैं

यगाना चंगेज़ी

उम्मीद-ओ-बीम ने मारा मुझे दो-राहे पर

यगाना चंगेज़ी

बुतों को देख के सब ने ख़ुदा को पहचाना

यगाना चंगेज़ी

सलामत रहें दिल में घर करने वाले

यगाना चंगेज़ी

रौशन तमाम काबा ओ बुत-ख़ाना हो गया

यगाना चंगेज़ी

ख़ुदी का नश्शा चढ़ा आप में रहा न गया

यगाना चंगेज़ी

काम दीवानों को शहरों से न बाज़ारों से

यगाना चंगेज़ी

दिल लगाने की जगह आलम-ए-ईजाद नहीं

यगाना चंगेज़ी

ख़ुद-रफ़्तगी है चश्म-ए-हक़ीक़त जो वा हुई

वज़ीर अली सबा लखनवी

कलेजा काँपता है देख कर इस सर्द-मेहरी को

वज़ीर अली सबा लखनवी

महशर का हमें क्या ग़म इस्याँ किसे कहते हैं

वज़ीर अली सबा लखनवी

बच कर कहाँ मैं उन की नज़र से निकल गया

वज़ीर अली सबा लखनवी

अदू-ए-जाँ बुत-ए-बे-बाक निकला

वज़ीर अली सबा लखनवी

बंद उस ने कर लिए थे घर के दरवाज़े अगर

वज़ीर आग़ा

रात भर इक सदा

वज़ीर आग़ा

अंकबूत

वज़ीर आग़ा

अलमिया

वज़ीर आग़ा

उम्र की इस नाव का चलना भी क्या रुकना भी क्या

वज़ीर आग़ा

सिखा दिया है ज़माने ने बे-बसर रहना

वज़ीर आग़ा

दिन ढल चुका था और परिंदा सफ़र में था

वज़ीर आग़ा

धार सी ताज़ा लहू की शबनम-अफ़्शानी में है

वज़ीर आग़ा

बे-ज़बाँ कलियों का दिल मैला किया

वज़ीर आग़ा

आसमाँ पर अब्र-पारे का सफ़र मेरे लिए

वज़ीर आग़ा

क्या ग़म जो हसरतों के दिए बुझ गए तमाम

वासिफ़ देहलवी

क़दम यूँ बे-ख़तर हो कर न मय-ख़ाने में रख देना

वासिफ़ देहलवी

बुझते हुए चराग़ फ़रोज़ाँ करेंगे हम

वासिफ़ देहलवी

कितनी ज़ुल्फ़ें उड़ीं कितने आँचल उड़े चाँद को क्या ख़बर

वसी शाह

कैसा मफ़्तूह सा मंज़र है कई सदियों से

वसी शाह

सो जाऊँ पर कैसे सोया जा सकता है

वसीम ताशिफ़

बाज़ औक़ात फ़राग़त में इक ऐसा लम्हा आता है

वसीम ताशिफ़

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