घर Poetry (page 10)

तंहाई को घर से रुख़्सत कर तो दो

ज़फ़र गोरखपुरी

मैं 'ज़फ़र' ता-ज़िंदगी बिकता रहा परदेस में

ज़फ़र गोरखपुरी

छत टपकती थी अगरचे फिर भी आ जाती थी नींद

ज़फ़र गोरखपुरी

सिलसिले के बाद कोई सिलसिला रौशन करें

ज़फ़र गोरखपुरी

रौशनी परछाईं पैकर आख़िरी

ज़फ़र गोरखपुरी

पुकारे जा रहे हो अजनबी से चाहते क्या हो

ज़फ़र गोरखपुरी

पल पल जीने की ख़्वाहिश में कर्ब-ए-शाम-ओ-सहर माँगा

ज़फ़र गोरखपुरी

पल पल जीने की ख़्वाहिश में कर्ब-ए-शाम-ओ-सहर माँगा

ज़फ़र गोरखपुरी

मेरी इक छोटी सी कोशिश तुझ को पाने के लिए

ज़फ़र गोरखपुरी

कौन याद आया ये महकारें कहाँ से आ गईं

ज़फ़र गोरखपुरी

जो आए वो हिसाब-ए-आब-ओ-दाना करने वाले थे

ज़फ़र गोरखपुरी

इरादा हो अटल तो मोजज़ा ऐसा भी होता है

ज़फ़र गोरखपुरी

बदन कजला गया तो दिल की ताबानी से निकलूँगा

ज़फ़र गोरखपुरी

अश्क-ए-ग़म आँख से बाहर भी नहीं आने का

ज़फ़र गोरखपुरी

शब के तारीक समुंदर से गुज़र आया हूँ

ज़फ़र गौरी

सात रंगों से बनी है याद ताज़ा

ज़फ़र गौरी

ख़्वाब रंगों से बनी है याद ताज़ा

ज़फ़र गौरी

जारी है कब से मा'रका ये जिस्म-ओ-जाँ में सर्द सा

ज़फ़र गौरी

ये दश्त-ए-शौक़ का लम्बा सफ़र अच्छा नहीं लगता

ज़फ़र अंसारी ज़फ़र

तिरे क़रीब रहूँ या कि मैं सफ़र में रहूँ

ज़फ़र अंसारी ज़फ़र

हालत-ए-बीमार-ए-ग़म पर जिस को हैरानी नहीं

ज़फ़र अंसारी ज़फ़र

थक के पत्थर की तरह बैठा हूँ रस्ते में 'ज़फ़र'

यूसुफ़ ज़फ़र

वो मेरी जान है दिल से कभी जुदा न हुआ

यूसुफ़ ज़फ़र

पानी को आग कह के मुकर जाना चाहिए

यूसुफ़ ज़फ़र

बे-तलब एक क़दम घर से न बाहर जाऊँ

यूसुफ़ ज़फ़र

खाँसती मद्धम सी इक आवाज़ जब से खो गई

यूसुफ़ तक़ी

ऐ पड़ोसी तू बता हम को तो कुछ होश नहीं

यूसुफ़ तक़ी

लम्हा लम्हा फैलती जाती है रात

यूसुफ़ तक़ी

शांति

यूसुफ़ राहत

ज़ख़्मों की मुनाजात में पिन्हाँ वो असर था

युसूफ़ जमाल

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