घर Poetry (page 11)

सोचा कि वा हो सब्ज़ दरीचा जो बंद था

युसूफ़ जमाल

लग़्ज़िशें तन्हाइयों की सब बता दी जाएँगी

युसूफ़ जमाल

इसी पे शहर की सारी हवाएँ बरहम थीं

यूसुफ़ हसन

उसी हरीफ़ की ग़ारत-गरी का डर भी था

यूसुफ़ हसन

पहले मैं तेरी नज़र में आया

यूसुफ़ हसन

क्या रूप बरस रहा है

यूसुफ़ हसन

आँख में ठहरा हुआ सपना बिखर भी जाएगा

यूसुफ़ हसन

ख़ून-ए-तमन्ना रंग लाया हो ऐसा भी हो सकता है

यूनुस ग़ाज़ी

चुप रहूँ कैसे मैं बर्बाद-ए-जहाँ होने तक

यूनुस ग़ाज़ी

मिला है तपता सहरा देखने को

यज़दानी जालंधरी

मिला है तपता सहरा देखने को

यज़दानी जालंधरी

लबों तक आया ज़बाँ से मगर कहा न गया

यज़दानी जालंधरी

कुछ लोग जो नख़वत से मुझे घूर रहे हैं

यावर अब्बास

ख़ुशी के दौर तो मेहमाँ थे आते जाते रहे

यासमीन हमीद

मुसलसल एक ही तस्वीर चश्म-ए-तर में रही

यासमीन हमीद

दौलत-ए-दर्द समेटो कि बिखरने को है

यासमीन हमीद

मैं घर से जाऊँ तो ताला लगा के जाती हूँ

यासमीन हबीब

ये कमरा और ये गर्द-ओ-ग़ुबार उस का है

यासमीन हबीब

पढ़ चुके हैं निसाब-ए-तंहाई

यशब तमन्ना

कमाल-ए-शौक़-ए-सफ़र भी उधर ही जाता है

यशब तमन्ना

करम नहीं तो सितम ही सही रवा रखना

यासीन क़ुदरत

रेत के इक शहर में आबाद हैं दर दर के लोग

यासीन अफ़ज़ाल

पलकों पे रुका क़तरा-ए-मुज़्तर की तरह हूँ

यासीन अफ़ज़ाल

लर्ज़ां तरसाँ मंज़र चुप

याक़ूब यावर

दाग़-हा-ए-दिल की ताबानी गई

याक़ूब अली आसी

क्या हुआ हम से जो दुनिया बद-गुमाँ होने लगी

याक़ूब आमिर

इक ख़ला सा है जिधर देखो इधर कुछ भी नहीं

याक़ूब आमिर

चंद घंटे शोर ओ ग़ुल की ज़िंदगी चारों तरफ़

याक़ूब आमिर

रौशनी का क़ालिब जब तीरगी में ढलता है

यहया ख़ालिद

ख़ुदा गवाह

यहया अमजद

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