घर Poetry (page 66)

बद-तालई का इलाज क्या हो

इमदाद अली बहर

चैन दुनिया में ज़मीं से ता-फ़लक दम भर नहीं

इमाम बख़्श नासिख़

हर तरफ़ इक जंग का माहौल है 'आज़म' यहाँ

इमाम अाज़म

सूरज की मीज़ान लिए हम, वो थे बर्फ़ की बाट लिए

इमाम अाज़म

शहर में ओले पड़े हैं सर सलामत है कहाँ

इमाम अाज़म

वक़्त वक़्त की बात है या दस्तूर है दुनिया का साईं

इलियास इश्क़ी

प्रीत-नगर की रीत नहीं है ऐसा ओछा-पन बाबा

इलियास इश्क़ी

यार परिंदे!

इलियास बाबर आवान

शत्तुल-अरब

इलियास बाबर आवान

ग़ैर-निसाबी तारीख़

इलियास बाबर आवान

थोड़ी चाँदी थोड़ा गारा लगता है

इलियास बाबर आवान

मेरा और फूलों का रिश्ता टूट गया

इलियास बाबर आवान

ग़मों की भीड़ में रस्ता बना के चलता हूँ

इलियास बाबर आवान

किस क़दर गुनाहों के मुर्तकिब हुए हैं हम

इकराम मुजीब

ऐ ख़ुदा भरम रखना बरक़रार इस घर का

इकराम मुजीब

क्या जाने किस की धुन में रहा दिल-फ़िगार चाँद

इकराम जनजुआ

ख़िरद को ख़ाना-ए-दिल का निगह-बाँ कर दिया हम ने

इज्तिबा रिज़वी

ख़िरद को ख़ाना-ए-दिल का निगह-बाँ कर दिया हम ने

इज्तिबा रिज़वी

इस क़दर बढ़ने लगे हैं घर से घर के फ़ासले

इफ़्तिख़ार क़ैसर

बे-घर होना बे-घर रहना सब अच्छा ठहरा

इफ़्तिख़ार क़ैसर

हम से अपने गाँव की मिट्टी के घर छीने गए

इफ़्तिख़ार क़ैसर

अपने ख़ूँ को ख़र्च किया है और कमाया शहर

इफ़्तिख़ार क़ैसर

ताक़ पर जुज़दान में लिपटी दुआएँ रह गईं

इफ़्तिख़ार नसीम

बहती रही नदी मिरे घर के क़रीब से

इफ़्तिख़ार नसीम

यूँ है तिरी तलाश पे अब तक यक़ीं मुझे

इफ़्तिख़ार नसीम

वो मिला मुझ को न जाने ख़ोल कैसा ओढ़ कर

इफ़्तिख़ार नसीम

सूरज नए बरस का मुझे जैसे डस गया

इफ़्तिख़ार नसीम

शाम से तन्हा खड़ा हूँ यास का पैकर हूँ मैं

इफ़्तिख़ार नसीम

सराए छोड़ के वो फिर कभी नहीं आया

इफ़्तिख़ार नसीम

रात को बाहर अकेले घूमना अच्छा नहीं

इफ़्तिख़ार नसीम

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