घर Poetry (page 88)

संग-ए-दर देख के सर याद आया

फ़ानी बदायुनी

रह जाए या बला से ये जान रह न जाए

फ़ानी बदायुनी

ख़ल्क़ कहती है जिसे दिल तिरे दीवाने का

फ़ानी बदायुनी

जी ढूँढता है घर कोई दोनों जहाँ से दूर

फ़ानी बदायुनी

दिल की हर लर्ज़िश-ए-मुज़्तर पे नज़र रखते हैं

फ़ानी बदायुनी

अंधेरों को निकाला जा रहा है

फ़ना निज़ामी कानपुरी

तू फूल की मानिंद न शबनम की तरह आ

फ़ना निज़ामी कानपुरी

हम आगही-ए-इश्क़ का अफ़्साना कहेंगे

फ़ना निज़ामी कानपुरी

ग़म हर इक आँख को छलकाए ज़रूरी तो नहीं

फ़ना निज़ामी कानपुरी

न दहर में न हरम में जबीं झुकी होगी

फ़ना बुलंदशहरी

मेरे रश्क-ए-क़मर तू ने पहली नज़र जब नज़र से मिलाई मज़ा आ गया

फ़ना बुलंदशहरी

तलाश

फख्र ज़मान

वो पहले अंधे कुएँ में गिराए जाते हैं

फख्र ज़मान

बोला हैं रंग कितने ज़माने के और भी

फ़ाख़िरा बतूल

तपता सूरज शाम को ढल जाएगा

फ़ैज़ी सम्बलपुरी

जो दिल को पहले मयस्सर था क्या हुआ उस का

फ़ैज़ी

ख़ला में गिरवी रक्खा अपने सारे ख़्वाबों को

फ़ैज़ान हाशमी

दोनों जहाँ से आ गया कर के इधर उधर की सैर

फ़ैज़ान हाशमी

बस यही सोच के रहता हूँ मैं ज़िंदा इस में

फ़ैज़ान हाशमी

बहुत सा काम तो पहले ही कर लिया मैं ने

फ़ैज़ान हाशमी

दिन उतरते ही नई शाम पहन लेता हूँ

फ़ैज़ ख़लीलाबादी

सिपाही का मर्सिया

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

शीशों का मसीहा कोई नहीं

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

मुलाक़ात

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

मरसिए

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

कुत्ते

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

जब तेरी समुंदर आँखों में

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

गाँव की सड़क

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

दिल-ए-मन मुसाफ़िर-ए-मन

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

'शोपीं' का नग़्मा बजता है

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

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