ग़ज़ल Poetry (page 8)

आदतन मायूस अब तो शाम है

शादाब उल्फ़त

ये सनम भी घटोर कितने हैं

शाद लखनवी

ख़त देखिए दीदार की सूझी ये नई है

शाद लखनवी

जिस के हम बीमार हैं ग़म ने उसे भी राँदा है

शाद लखनवी

मजबूर हैं पर इतने तो मजबूर भी नहीं

शबनम शकील

चलती रहती है तसलसुल से जुनूँ-ख़ेज़ हवा

शबनम शकील

मैं ने किस शौक़ से इक उम्र ग़ज़ल-ख़्वानी की

शबनम रूमानी

हर साँस में है सरीर-ए-ख़ामा

शबनम रूमानी

ईमा-ए-ग़ज़ल करती हैं मौसम की अदाएँ

शानुल हक़ हक़्क़ी

कभी तलाश न ज़ाए न राएगाँ होगी

शाद आरफ़ी

आ कि हस्ती बे-लब-ओ-बे-जोश है तेरे बग़ैर

सीमाब अकबराबादी

ज़र्रे ज़र्रे हैं अक्स के हर-सू

सीमा शर्मा मेरठी

सूरज की तपती धूप ने मारा है इन दिनों

सीमा शर्मा मेरठी

चाँद ख़ुद को देख कर शरमाएगा

सीमा शर्मा मेरठी

आसमाँ भी पुकारता है मुझे

सीमा शर्मा मेरठी

यूँ बातें तो बहुत सारी करोगे

सय्यदा अरशिया हक़

'सौदा' तू इस ग़ज़ल को ग़ज़ल-दर-ग़ज़ल ही कह

मोहम्मद रफ़ी सौदा

नासेह को जेब सीने से फ़ुर्सत कभू न हो

मोहम्मद रफ़ी सौदा

दिल में तिरे जो कोई घर कर गया

मोहम्मद रफ़ी सौदा

देखूँ हूँ यूँ मैं उस सितम-ईजाद की तरफ़

मोहम्मद रफ़ी सौदा

अब तो सँवारने के लिए हिज्र भी नहीं

सरवत ज़ेहरा

फिर आस दे के आज को कल कर दिया गया

सरवत ज़ेहरा

देख लो रंग गर मिरे तिल के

सरवत मुख़तार

आज दीवाने को बे-वज्ह सताया जाए

सरवर नेपाली

वाक़िफ़ थे कहाँ हम दिल-ए-ना-चार से पहले

सरवर आलम राज़

सुब्ह को चैन न हो शाम को आराम न हो

सरवर आलम राज़

लड़खड़ाता हूँ कभी ख़ुद ही सँभल जाता हूँ

सरफ़राज़ नवाज़

ऐसे लगे है नौकरी माल-ए-हराम के बग़ैर

सरफ़राज़ शाहिद

इश्क़ में कुछ इस सबब से भी है आसानी मुझे

सरफ़राज़ शाहिद

ऐसे लगे है नौकरी माल-ए-हराम के बग़ैर

सरफ़राज़ शाहिद

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