हाथ Poetry (page 62)

वो ताज़ा-दम हैं नए शो'बदे दिखाते हुए

अज़हर इनायती

उस को आदाब बिछड़ने के सिखाता हुआ मैं

अज़हर इनायती

तिरे तक़ाज़ों पे चेहरे बदल रहा हूँ मैं

अज़हर इनायती

ख़त उस के अपने हाथ का आता नहीं कोई

अज़हर इनायती

इस हादसे को देख के आँखों में दर्द है

अज़हर इनायती

चलते चलते साल कितने हो गए

अज़हर इनायती

अपने आँचल में छुपा कर मिरे आँसू ले जा

अज़हर इनायती

किसी बदन की सयाहत निढाल करती है

अज़हर फ़राग़

कमी है कौन सी घर में दिखाने लग गए हैं

अज़हर फ़राग़

डरे हुए हैं सभी लोग अब्र छाने से

अज़हर फ़राग़

भँवर से ये जो मुझे बादबान खींचता है

अज़हर फ़राग़

भँवर से ये जो मुझे बादबान खींचता है

अज़हर फ़राग़

वो शब के साए में फ़स्ल-ए-नशात काटते हैं

अज़हर अदीब

क्या तेरा क्या मेरा ख़्वाब

अज़हर अदीब

दर टूटने लगे कभी दीवार गिर पड़े

अज़हर अदीब

इश्क़ अपना अजब तमाशा है

अज़ीम कुरेशी

दिल को रहीन-ए-लज़्ज़त-ए-दरमाँ न कर सके

आज़म चिश्ती

पेड़ आँगन के तिरे जब बारवर हो जाएँगे

आज़ाद गुरदासपुरी

फिर इस के बा'द का कोई न हो गुज़र मुझ में

आज़ाद गुलाटी

ख़ुद हमीं को राहतों के कैफ़ का चसका न था

आज़ाद गुलाटी

बहुत लम्बा सफ़र तपती सुलगती ख़्वाहिशों का था

आज़ाद गुलाटी

उश्शाक़ बहुत हैं तिरे बीमार बहुत हैं

अय्यूब ख़ावर

इक तुम कि हो बे-ख़बर सदा के

अय्यूब ख़ावर

बर्ग-ए-गुल शाख़-ए-हिज्र का कर दे

अय्यूब ख़ावर

उस ने हमारे हाथ में इक हाथ क्या दिया

आएशा मसूद मलिक

उस निगाह-ए-नाज़ ने यूँ रात-भर तज्सीम की

औरंगज़ेब

निहत्ते आदमी पे बढ़ के ख़ंजर तान लेती है

औरंगज़ेब

फ़ज़ा में हाथ तो उट्ठे थे एक साथ कई

अतीक़ुल्लाह

मैं कि तुम पे बाज़ हूँ

अतीक़ुल्लाह

मिरे सुपुर्द कहाँ वो ख़ज़ाना करता था

अतीक़ुल्लाह

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