हाथ Poetry (page 61)

उठा के मेरे ज़ेहन से शबाब कोई ले गया

अज़ीज़ तमन्नाई

रसूल-ए-काज़िब

अज़ीज़ क़ैसी

ग़रीब शहर

अज़ीज़ क़ैसी

चोर-बाज़ार

अज़ीज़ क़ैसी

अहद-नामा-ए-इमराेज़

अज़ीज़ क़ैसी

आख़िरी दिन से पहले

अज़ीज़ क़ैसी

हर आँख लहू सागर है मियाँ हर दिल पत्थर सन्नाटा है

अज़ीज़ क़ैसी

अपनों के करम से या क़ज़ा से

अज़ीज़ क़ैसी

सुब्ह और शाम के सब रंग हटाए हुए हैं

अज़ीज़ नबील

मैं दस्तरस से तुम्हारी निकल भी सकता हूँ

अज़ीज़ नबील

जिस तरफ़ चाहूँ पहुँच जाऊँ मसाफ़त कैसी

अज़ीज़ नबील

शीशा-ए-दिल को यूँ न उठाओ

अज़ीज़ लखनवी

दिल का छाला फूटा होता

अज़ीज़ लखनवी

चश्म-ए-साक़ी का तसव्वुर बज़्म में काम आ गया

अज़ीज़ लखनवी

बाज़ी-ए-इश्क़ मरे बैठे हैं

अज़ीज़ लखनवी

वही दाग़-ए-लाला की बात है कि ब-नाम-ए-हुस्न उधर गई

अज़ीज़ हामिद मदनी

न फ़ासले कोई निकले न क़ुर्बतें निकलीं

अज़ीज़ हामिद मदनी

ग़लत-बयाँ ये फ़ज़ा महर ओ कीं दरोग़ दरोग़

अज़ीज़ हामिद मदनी

बैठो जी का बोझ उतारें दोनों वक़्त यहीं मिलते हैं

अज़ीज़ हामिद मदनी

न ये क़ानून काम आया था राँझे के ज़रा सा भी

अज़ीज़ फ़ैसल

है कामयाबी-ए-मर्दां में हाथ औरत का

अज़ीज़ फ़ैसल

जैसे कोई रोता है गले प्यार से लग कर

अज़ीज़ एजाज़

मुझे कहाँ मिरे अंदर से वो निकालेगा

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

मेरी तस्वीर बनाने को जो हाथ उठता है

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

मुझे कहाँ मिरे अंदर से वो निकालेगा

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

ये अपनी बेबसी है या कि अपनी बे-हिसी यारो

अज़ीज़ अन्सारी

हम उस को भूल बैठे हैं अँधेरे हम पे तारी हैं

अज़ीज़ अन्सारी

सुकून-ए-दिल गया नज़रों से सब क़तारे गए

अज़ीम हैदर सय्यद

न जाने शाम ने क्या कह दिया सवेरे से

अज़हर नवाज़

हैरान हूँ कि आज ये क्या हादिसा हुआ

अज़हर नैयर

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