हाथ Poetry (page 59)

मान मौसम का कहा छाई घटा जाम उठा

बशीर बद्र

कोई फूल धूप की पत्तियों में हरे रिबन से बँधा हुआ

बशीर बद्र

कहीं चाँद राहों में खो गया कहीं चाँदनी भी भटक गई

बशीर बद्र

कभी तो शाम ढले अपने घर गए होते

बशीर बद्र

घर से निकले अगर हम बहक जाएँगे

बशीर बद्र

अज़्मतें सब तिरी ख़ुदाई की

बशीर बद्र

आँखों में रहा दिल में उतर कर नहीं देखा

बशीर बद्र

क्या बिछड़ कर रह गया जाने भरी बरसात में

बशीर मुंज़िर

पता नहीं वो कौन था

बशर नवाज़

बाज़ार-ए-ज़िंदगी में जमे कैसे अपना रंग

बशर नवाज़

पर्दा उलट के उस ने जो चेहरा दिखा दिया

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़

मैं अगर रोने लगूँ रुतबा-ए-वाला बढ़ जाए

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़

दिल जो सूरत-गर-ए-मअ'नी का सनम-ख़ाना बने

बर्क़ देहलवी

पहले हर बात पे हम सोचते थे

बाक़ी सिद्दीक़ी

कुछ न पा कर भी मुतमइन हैं हम

बाक़ी सिद्दीक़ी

यूँ भी होने का पता देते हैं

बाक़ी सिद्दीक़ी

यूँ भी होने का पता देते हैं

बाक़ी सिद्दीक़ी

रंग-ए-दिल रंग-ए-नज़र याद आया

बाक़ी सिद्दीक़ी

दाग़-ए-दिल हम को याद आने लगे

बाक़ी सिद्दीक़ी

उल्फ़त में तिरी ऐ बुत-ए-बे-मेहर-ओ-मोहब्बत

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

क्या तुझ को लिखूँ ख़त हरकत हाथ से गुम है

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

सीखा जो क़लम से न-ए-ख़ाली का बजाना

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

मत तंग हो करे जो फ़लक तुझ को तंग-दस्त

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

चश्म-ए-तर जाम दिल-ए-बादा-कशाँ है शीशा

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

दीमक

बाक़र मेहदी

रहता है ज़ुल्फ़-ए-यार मिरे मन से मन लगा

बाक़र आगाह वेलोरी

माँ

बक़ा बलूच

किरदार ही से ज़ीनत-ए-अफ़्लाक हो गए

बनो ताहिरा सईद

सबा के हाथ पीले हो गए

बलराज कोमल

अब उजड़ने के हम न बसने के

बकुल देव

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