हुआ Poetry (page 11)

क़ैस कहता था यही फ़िक्र है दिन-रात मुझे

ज़रीफ़ लखनवी

मजनूँ का जो ऐ लैला जूता न फटा होता

ज़रीफ़ लखनवी

लायल-पूर के मच्छर

ज़रीफ़ जबलपूरी

दुनिया की सल्तनत में ख़ुदा के ख़िलाफ़ हैं

ज़मीर काज़मी

मेरे ख़ुर्शीद ओ क़मर आए नहीं

ज़मीर अज़हर

पुर-हौल जंगलों की सदा मेरे साथ है

ज़मान कंजाही

मैं रतजगों के मुकम्मल अज़ाब देखूँगा

ज़मान कंजाही

ज़मीन-ए-इश्क़-ओ-वफ़ा पे उड़ती हिकायतें भी नई नहीं हैं

ज़ाकिर ख़ान ज़ाकिर

मुद्दत हुई न मुझ से मिरा राब्ता हुआ

ज़ाकिर ख़ान ज़ाकिर

लबों की जुम्बिश नवा-ए-बुलबुल है शोख़ लहजा तिरा क़यामत

ज़ाकिर ख़ान ज़ाकिर

ख़याल-ओ-ख़्वाब में डूबी दीवार-ओ-दर बनाती हैं

ज़ाकिर ख़ान ज़ाकिर

ग़ज़ल के शानों पे ख़्वाब-ए-हस्ती ब-चश्म-ए-पुर-नम ठहर गए हैं

ज़ाकिर ख़ान ज़ाकिर

दिल के बुझते हुए ज़ख़्मों को हवा देता है

ज़ाकिर ख़ान ज़ाकिर

दर्द को ज़ब्त की सरहद से गुज़र जाने दो

ज़ाकिर ख़ान ज़ाकिर

चुप के सहरा में फ़क़त एक सदा कौन हूँ मैं

ज़ाकिर ख़ान ज़ाकिर

अजनबी ख़ुशबू की आहट से महक उट्ठा बदन

ज़की तारिक़

मेरे ख़्वाबों का कभी जब आसमाँ रौशन हुआ

ज़की तारिक़

कौन कहता है गुम हुआ परतव

ज़की तारिक़

मरने के बअ'द कोई पशेमाँ हुआ तो क्या

ज़की काकोरवी

तिरी जुस्तुजू तिरी आरज़ू मुझे काम तेरे ही काम से

ज़की काकोरवी

मेरी बर्बादियों की ये तस्वीर

ज़ख़मी हिसारी

पुरवाइयों से लड़ती हैं पच्छिम की आँधियाँ

ज़काउद्दीन शायाँ

तंग कमरों में है महबूस फ़ज़ा का मतलब

ज़काउद्दीन शायाँ

सियह बिस्तर पड़े हैं सुब्ह-ए-नज़्ज़ारा उतर आए

ज़काउद्दीन शायाँ

रात आँसू को तिरी आँख में देखा हम ने

ज़काउद्दीन शायाँ

तअल्लुक़ ही नहीं है जिन से मेरा

ज़करिय़ा शाज़

मुझ तक निगाह आई जो वापस पलट गई

ज़करिय़ा शाज़

खोया हुआ था हासिल होने वाला हूँ

ज़करिय़ा शाज़

कहाँ दिन रात में रक्खा हुआ हूँ

ज़करिय़ा शाज़

क़ाइल भला हों नामा-बरी में सबा के ख़ाक

ज़ैनुल आब्दीन ख़ाँ आरिफ़

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