हुआ Poetry (page 10)

ज़ख़्म लगा कर उस का भी कुछ हाथ खुला

ज़ेब ग़ौरी

तूफ़ाँ में नाव आई तो क्या सम्त क्या निशाँ

ज़ेब ग़ौरी

संग-ए-बेहिस से उठी मौज-ए-सियह-ताब कोई

ज़ेब ग़ौरी

मैं ने बेताबाना बढ़ कर दश्त में आवाज़ दी

ज़ेब ग़ौरी

जगमगाता हुआ ख़ंजर मिरे सीने में उतार

ज़ेब ग़ौरी

एक झोंका हवा का आया 'ज़ेब'

ज़ेब ग़ौरी

छेड़ कर जैसे गुज़र जाती है दोशीज़ा हवा

ज़ेब ग़ौरी

वो और मोहब्बत से मुझे देख रहा हो

ज़ेब ग़ौरी

शोला-ए-मौज-ए-तलब ख़ून-ए-जिगर से निकला

ज़ेब ग़ौरी

पहले मुझ को भी ख़याल-ए-यार का धोका हुआ

ज़ेब ग़ौरी

नक़्श-ए-तस्वीर न वो संग का पैकर कोई

ज़ेब ग़ौरी

मेरा अदम वजूद भी क्या ज़र-निगार था

ज़ेब ग़ौरी

मौज-ए-रेग सराब-सहरा कैसे बनती है

ज़ेब ग़ौरी

मैं अक्स-ए-आरज़ू था हवा ले गई मुझे

ज़ेब ग़ौरी

लहर लहर क्या जगमग जगमग होती है

ज़ेब ग़ौरी

ख़ंजर चमका रात का सीना चाक हुआ

ज़ेब ग़ौरी

ख़ाक आईना दिखाती है कि पहचान में आ

ज़ेब ग़ौरी

झुके हुए पेड़ों के तनों पर छाप है चंचल धारे की

ज़ेब ग़ौरी

हो चुके गुम सारे ख़द्द-ओ-ख़ाल मंज़र और मैं

ज़ेब ग़ौरी

इक पीली चमकीली चिड़िया काली आँख नशीली सी

ज़ेब ग़ौरी

दिन तिरी याद में ढल जाता है आँसू की तरह

ज़ेब ग़ौरी

दिन है बे-कैफ़ बे-गुनाहों सा

ज़ेब ग़ौरी

बुझते सूरज ने लिया फिर ये सँभाला कैसा

ज़ेब ग़ौरी

बुझ कर भी शो'ला दाम-ए-हवा में असीर है

ज़ेब ग़ौरी

बे-कराँ दश्त-ए-बे-सदा मेरे

ज़ेब ग़ौरी

बे-हिसी पर मिरी वो ख़ुश था कि पत्थर ही तो है

ज़ेब ग़ौरी

बस एक पर्दा-ए-इग़माज़ था कफ़न उस का

ज़ेब ग़ौरी

और गुलों का काम नहीं होता कोई

ज़ेब ग़ौरी

अक्स-ए-फ़लक पर आईना है रौशन आब ज़ख़ीरों का

ज़ेब ग़ौरी

तेरे रहने को मुनासिब था कि छप्पर होता

ज़रीफ़ लखनवी

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