हुआ Poetry (page 121)

उस का हाल-ए-कमर खुला हमदम

हातिम अली मेहर

सर झुकाता नहीं कभी शीशा

हातिम अली मेहर

पूछेगा जो वो रश्क-ए-क़मर हाल हमारा

हातिम अली मेहर

करते हैं शौक़-ए-दीद में बातें हवा से हम

हातिम अली मेहर

करें क्या हवस करें क्या हवस करें क्या हवस करें क्या हवस

हातिम अली मेहर

इश्क़-ए-जान-ए-जहाँ नसीब हुआ

हातिम अली मेहर

इस दौर में हर इक तह-ए-चर्ख़-ए-कुहन लुटा

हातिम अली मेहर

गुल-बाँग थी गुलों की हमारा तराना था

हातिम अली मेहर

ग़ैर हँसते हैं फ़क़त इस लिए टल जाता हूँ

हातिम अली मेहर

बदन-ए-यार की बू-बास उड़ा लाए हवा

हातिम अली मेहर

बदन-ए-यार की बू-बास उड़ा लाए हवा

हातिम अली मेहर

अजब है 'मेहर' से उस शोख़ की विसाल का वक़्त

हातिम अली मेहर

ये तजरबा हुआ है मोहब्बत की राह में

हस्तीमल हस्ती

ये मुमकिन है कि मिल जाएँ तिरी खोई हुई चीज़ें

हस्तीमल हस्ती

शीशे के मुक़द्दर में बदल क्यूँ नहीं होता

हस्तीमल हस्ती

इस बार मिले हैं ग़म कुछ और तरह से भी

हस्तीमल हस्ती

ढूँडा है हर जगह प कहीं पर नहीं मिला

हस्तीमल हस्ती

चराग़ दिल का मुक़ाबिल हवा के रखते हैं

हस्तीमल हस्ती

ख़ुशा वो बाग़ महकती हो जिस में बू तेरी

हसरत शरवानी

रौशन जमाल-ए-यार से है अंजुमन तमाम

हसरत मोहानी

कट गई एहतियात-ए-इश्क़ में उम्र

हसरत मोहानी

इल्तिफ़ात-ए-यार था इक ख़्वाब-ए-आग़ाज़-ए-वफ़ा

हसरत मोहानी

ऐसे बिगड़े कि फिर जफ़ा भी न की

हसरत मोहानी

यूँ तो आशिक़ तिरा ज़माना हुआ

हसरत मोहानी

वस्ल की बनती हैं इन बातों से तदबीरें कहीं

हसरत मोहानी

तुझ से गरवीदा यक ज़माना रहा

हसरत मोहानी

तासीर-ए-बर्क़-ए-हुस्न जो उन के सुख़न में थी

हसरत मोहानी

सियहकार थे बा-सफ़ा हो गए हम

हसरत मोहानी

रौशन जमाल-ए-यार से है अंजुमन तमाम

हसरत मोहानी

क्या काम उन्हें पुर्सिश-ए-अरबाब-ए-वफ़ा से

हसरत मोहानी

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