हुआ Poetry (page 17)
जिस ने नफ़रत ही मुझे दी न 'ज़फ़र' प्यार दिया
ज़फ़र इक़बाल
जहाँ मेरे न होने का निशाँ फैला हुआ है
ज़फ़र इक़बाल
इतना ठहरा हुआ माहौल बदलना पड़ जाए
ज़फ़र इक़बाल
हम ने आवाज़ न दी बर्ग ओ नवा होते हुए
ज़फ़र इक़बाल
हज़ार बंदिश-ए-औक़ात से निकलता है
ज़फ़र इक़बाल
हवा बदल गई उस बेवफ़ा के होने से
ज़फ़र इक़बाल
है कोई इख़्तियार दुनिया पर
ज़फ़र इक़बाल
हद हो चक्की है शर्म-ए-शकेबाई ख़त्म हो
ज़फ़र इक़बाल
गिरने की तरह का न सँभलने की तरह का
ज़फ़र इक़बाल
छुपा हुआ जो नुमूदार से निकल आया
ज़फ़र इक़बाल
बीनाई से बाहर कभी अंदर मुझे देखे
ज़फ़र इक़बाल
बिखर बिखर गए अल्फ़ाज़ से अदा न हुए
ज़फ़र इक़बाल
बिजली गिरी है कल किसी उजड़े मकान पर
ज़फ़र इक़बाल
बस एक बार किसी ने गले लगाया था
ज़फ़र इक़बाल
बदला ये लिया हसरत-ए-इज़हार से हम ने
ज़फ़र इक़बाल
अपने इंकार के बर-अक्स बराबर कोई था
ज़फ़र इक़बाल
ऐसी कोई दरपेश हवा आई हमारे
ज़फ़र इक़बाल
अगर कभी तिरे आज़ार से निकलता हूँ
ज़फ़र इक़बाल
आग का रिश्ता निकल आए कोई पानी के साथ
ज़फ़र इक़बाल
मेरे अंदर का ग़ुरूर अंदर गुज़रता रह गया
ज़फर इमाम
इक नदी में सैकड़ों दरिया की तुग़्यानी मिली
ज़फर इमाम
मेरे नाज़ुक सवाल में उतरो
ज़फ़र हमीदी
मैं ज़िंदगी का नक़्शा तरतीब दे रहा हूँ
ज़फ़र हमीदी
क्यूँ मैं हाइल हो जाता हूँ अपनी ही तन्हाई में
ज़फ़र हमीदी
झील में उस का पैकर देखा जैसे शोला पानी में
ज़फ़र हमीदी
जब भी वो मुझ से मिला रोने लगा
ज़फ़र हमीदी
तो फिर मैं क्या अगर अन्फ़ास के सब तार गुम उस में
ज़फ़र गोरखपुरी
सिलसिले के बाद कोई सिलसिला रौशन करें
ज़फ़र गोरखपुरी
रौशनी परछाईं पैकर आख़िरी
ज़फ़र गोरखपुरी
पुकारे जा रहे हो अजनबी से चाहते क्या हो
ज़फ़र गोरखपुरी
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