हुआ Poetry (page 34)

लब तक आया गिला हमेशा से

ताजदार आदिल

जो मिल गया है यहाँ जल्वा-ए-ख़याली है

ताजदार आदिल

किस ने आ कर हम को दी आवाज़ पिछली रात में

ताज सईद

वफ़ा का ज़िक्र छिड़ा था कि रात बीत गई

तैमूर हसन

मिरा बातिन मुझे हर पल नई दुनिया दिखाता है

तैमूर हसन

मैं ने बख़्श दी तिरी क्यूँ ख़ता तुझे इल्म है

तैमूर हसन

बहाऊँगा न मैं आँसू न मुस्कराउँगा

तैमूर हसन

इस एक डर से ख़्वाब देखता नहीं

तहज़ीब हाफ़ी

ये तय हुआ है कि शेर ओ अदब के पैमाने

तहसीन फ़िराक़ी

मैं जिन गलियों में पैहम बरसर-ए-गर्दिश रहा हूँ

तहसीन फ़िराक़ी

ला-यख़ुल

तहसीन फ़िराक़ी

इसे मैं और ये मेरा असा ही तय करेगा

तहसीन फ़िराक़ी

चमन इतना ख़िज़ाँ-आसार पहले कब हुआ था

तहसीन फ़िराक़ी

तो तय हुआ ना कि जब भी लिखना रुतों के सारे अज़ाब लिखना

ताहिर तोनस्वी

सुकून-ए-दिल में वो बन के जब इंतिशार उतरा तो मैं ने देखा

ताहिर फ़राज़

मिरी मंज़िलें कहीं और हैं मिरा रास्ता कोई और है

ताहिर फ़राज़

जब मिरे होंटों पे मेरी तिश्नगी रह जाएगी

ताहिर फ़राज़

दर्द ख़ामोश रहा टूटती आवाज़ रही

ताहिर फ़राज़

तीरगी की क्या अजब तरकीब है ये

ताहिर अज़ीम

ख़्वाहिशों की बादशाही कुछ नहीं

ताहिर अज़ीम

इक अनोखी रस्म को ज़िंदा रखा है

ताहिर अज़ीम

आँखों में है कैसा पानी बंद है क्यूँ आवाज़

ताहिर अदीम

वही बे-लिबास क्यारियाँ कहीं बेल बूटों के बल नहीं

तफ़ज़ील अहमद

तन्हा कर के मुझ को सलीब-ए-सवाल पे छोड़ दिया

तफ़ज़ील अहमद

शहर को चोट पे रखती है गजर में कोई चीज़

तफ़ज़ील अहमद

लहरों में भँवर निकलेंगे मेहवर न मिलेगा

तफ़ज़ील अहमद

इक परेशानी अलग थी और पशेमानी अलग

तफ़ज़ील अहमद

अव्वल वही सैराब था सानी भी वही था

तफ़ज़ील अहमद

इक उम्र हुई और मैं अपने से जुदा हूँ

ताबिश सिद्दीक़ी

देर तक मिल के रोते रहे राह में

ताबिश मेहदी

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