प्रेम Poetry (page 13)

दिल के पर्दों में छुपाया है तिरे इश्क़ का राज़

ताजवर नजीबाबादी

बर्दाश्त दर्द-ए-इश्क़ की दुश्वार हो गई

ताजवर नजीबाबादी

मोहब्बत में ज़ियाँ-कारी मुराद-ए-दिल न बन जाए

ताजवर नजीबाबादी

हश्र में फिर वही नक़्शा नज़र आता है मुझे

ताजवर नजीबाबादी

ऐ आरज़ू-ए-शौक़ तुझे कुछ ख़बर है आज

ताजवर नजीबाबादी

वो इस कमाल से खेला था इश्क़ की बाज़ी

ताजदार आदिल

तिलिस्म-ए-इश्क़ था सब उस का साथ होने तक

ताजदार आदिल

जो मिल गया है यहाँ जल्वा-ए-ख़याली है

ताजदार आदिल

खिड़की में एक नार जो महव-ए-ख़याल है

ताज सईद

नहीं उड़ाऊँगा ख़ाक रोया नहीं करूँगा

तैमूर हसन

बहार आने की उम्मीद के ख़ुमार में था

तैमूर हसन

इस एक डर से ख़्वाब देखता नहीं

तहज़ीब हाफ़ी

बता ऐ अब्र मुसावात क्यूँ नहीं करता

तहज़ीब हाफ़ी

तिरी गली में गए कितने माह ओ साल हुए

तहसीन फ़िराक़ी

इसे मैं और ये मेरा असा ही तय करेगा

तहसीन फ़िराक़ी

तो तय हुआ ना कि जब भी लिखना रुतों के सारे अज़ाब लिखना

ताहिर तोनस्वी

मिरी मंज़िलें कहीं और हैं मिरा रास्ता कोई और है

ताहिर फ़राज़

अब के बरस होंटों से मेरे तिश्ना-लबी भी ख़त्म हुइ

ताहिर फ़राज़

हर अदा तुंद और नबात उस की

ताबिश सिद्दीक़ी

तेरी सूरत निगाहों में फिरती रहे इश्क़ तेरा सताए तो मैं क्या करूँ

ताबिश कानपुरी

हुस्न और इश्क़ दोनों में तफ़रीक़ है पर इन्हीं दोनों पे मेरा ईमान है

ताबिश कानपुरी

तेरी सूरत निगाहों में फिरती रहे इश्क़ तेरा सताए तो मैं क्या करूँ

ताबिश कानपुरी

ये शहर आफ़तों से तो ख़ाली कोई न था

ताबिश कमाल

पाबंदी-ए-हुदूद से बेगाना चाहिए

ताबिश देहलवी

धूमें मचाएँ सब्ज़ा रौंदें फूलों को पामाल करें

ताबिश देहलवी

क़ुसूर इश्क़ में ज़ाहिर है सब हमारा था

ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ

मंज़िलों से बेगाना आज भी सफ़र मेरा

ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ

हवा भी इश्क़ की लगने न देता मैं उसे हरगिज़

ताबाँ अब्दुल हई

आतिश-ए-इश्क़ में जो जल न मरें

ताबाँ अब्दुल हई

तुम्हारे हिज्र में रहता है हम को ग़म मियाँ-साहिब

ताबाँ अब्दुल हई

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