प्रेम Poetry (page 11)

दिलों पे दर्द का इम्कान भी ज़ियादा नहीं

विपुल कुमार

उम्र-भर उस की निशानी देखिए

विनीत आश्ना

और सब कुछ बहाल रक्खा है

विनीत आश्ना

कई सम्तों में रस्ता बट रहा है

विकास शर्मा राज़

दर पे तेरे जो सर झुका लूँगा

विजय शर्मा अर्श

इश्क़ ने बरबाद कर दी ज़िंदगी हाए रे इश्क़

विजय अरुण

उस से यही कहता हूँ वाजिब एहतिराम-ए-इश्क़ है

वारिस किरमानी

जी में है इक दिन झूम कर उस शोख़ को सज्दा करूँ

वारिस किरमानी

आशिक़ हुए तो इश्क़ में होश्यार क्यूँ न थे

वारिस किरमानी

ज़मीं से आसमाँ तक आसमाँ से ला-मकाँ तक है

वहशी कानपुरी

हो तिरा इश्क़ मिरी ज़ात का मेहवर जैसे

उरूज ज़ेहरा ज़ैदी

मेरा साक़ी

उरूज क़ादरी

इश्क़ फिर इश्क़ है आशुफ़्ता-सरी माँगे है

उनवान चिश्ती

इश्क़ फिर इश्क़ है आशुफ़्ता-सरी माँगे है

उनवान चिश्ती

हिजाब उट्ठे हैं लेकिन वो रू-ब-रू तो नहीं

उम्मीद फ़ाज़ली

आईना-ए-वहशत को जिला जिस से मिली है

उम्मीद फ़ाज़ली

शिद्दत-ए-इज़हार-ए-मज़मूँ से है घबराई हुई

तुफ़ैल बिस्मिल

ज़िंदगानी का कोई बाब समझ लो लड़की

त्रिपुरारि

दिन में सूरज है मिरी महरूमियों का तर्जुमाँ

तिश्ना बरेलवी

फ़िक्र-ए-मआश ओ इश्क़-ए-बुताँ याद-ए-रफ़्तगाँ

तिलोकचंद महरूम

अक़्ल को क्यूँ बताएँ इश्क़ का राज़

तिलोकचंद महरूम

वो दिल कहाँ है अहल-ए-नज़र दिल कहें जिसे

तिलोकचंद महरूम

कम न थी सहरा से कुछ भी ख़ाना-वीरानी मिरी

तिलोकचंद महरूम

हमारे वास्ते है एक जीना और मर जाना

तिलोकचंद महरूम

दस्त-ए-ख़िरद से पर्दा-कुशाई न हो सकी

तिलोकचंद महरूम

अच्छा है कि सिर्फ़ इश्क़ कीजे

तौसीफ़ तबस्सुम

इस पार जहान-ए-रफ़्तगाँ है

तौसीफ़ तबस्सुम

दिल की बात न मानी होती इश्क़ किया क्यूँ पीरी में

तौसीफ़ तबस्सुम

कल जहाँ दीवार ही दीवार थी

तौक़ीर तक़ी

सूरत-ए-इश्क़ बदलता नहीं तू भी मैं भी

तौक़ीर तक़ी

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