प्रेम Poetry (page 10)

सीने में मिरे दाग़-ए-ग़म-ए-इश्क़-ए-नबी है

वहशत रज़ा अली कलकत्वी

ज़ब्त की कोशिश है जान-ए-ना-तवाँ मुश्किल में है

वहशत रज़ा अली कलकत्वी

यही है इश्क़ की मुश्किल तो मुश्किल आसाँ है

वहशत रज़ा अली कलकत्वी

यहाँ हर आने वाला बन के इबरत का निशाँ आया

वहशत रज़ा अली कलकत्वी

तीर-ए-नज़र ने ज़ुल्म को एहसाँ बना दिया

वहशत रज़ा अली कलकत्वी

शौक़ ने इशरत का सामाँ कर दिया

वहशत रज़ा अली कलकत्वी

शौक़ देता है मुझे पैग़ाम-ए-इश्क़

वहशत रज़ा अली कलकत्वी

नहीं कि इश्क़ नहीं है गुल ओ समन से मुझे

वहशत रज़ा अली कलकत्वी

किस नाम-ए-मुबारक ने मज़ा मुँह को दिया है

वहशत रज़ा अली कलकत्वी

कहते हो अब मिरे मज़लूम पे बेदाद न हो

वहशत रज़ा अली कलकत्वी

ऐ अहल-ए-वफ़ा ख़ाक बने काम तुम्हारा

वहशत रज़ा अली कलकत्वी

मुद्दत हुई है मदह-ए-हसीनाँ किए हुए

वहीदुद्दीन सलीम

मुद्दत हुई है मदह-ए-हसीनाँ किए हुए

वहीदुद्दीन सलीम

मेरी दीवानगी-ए-इश्क़ है इक दर्स-ए-जहाँ

वाहिद प्रेमी

ग़म भी है कैफ़ भी है सोज़ भी है साज़ भी है

वाहिद प्रेमी

ग़म के हाथों शुक्र-ए-ख़ुदा है इश्क़ का चर्चा आम नहीं

वहीद क़ुरैशी

तुझ में तो एक ख़ू-ए-जफ़ा और हो गई

वहीद इलाहाबादी

तवाना ख़ूबसूरत जिस्म

वहीद अख़्तर

ज़बान-ए-ख़ल्क़ पे आया तो इक फ़साना हुआ

वहीद अख़्तर

कहीं शुनवाई नहीं हुस्न की महफ़िल के ख़िलाफ़

वहीद अख़्तर

हम जो टूटे तो ग़म-ए-दहर का पैमाना बने

वहीद अख़्तर

दीवानों को मंज़िल का पता याद नहीं है

वहीद अख़्तर

वफ़ा की मंज़िलों को हम ने इस तरह सजा लिया

वफ़ा सिद्दीक़ी

अगर कुछ मोड़ रस्ते में न आते

विश्वनाथ दर्द

तख़्त-ए-ताऊस मिरा तख़्त-ए-हज़ारा तुम हो

विश्मा ख़ान विश्मा

तमाम इश्क़ की मोहलत है इस आँखों में

विपुल कुमार

सफीर-ए-इश्क़ हमें अब तो हम सफ़र कर लो

विपुल कुमार

कुछ इस लिए भी तिरी आरज़ू नहीं है मुझे

विपुल कुमार

अब के मसरूफ़ियत-ए-इश्क़ बहुत है हम को

विपुल कुमार

जुनूँ के बाब में अब के ये राएगानी हो

विपुल कुमार

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