प्रेम Poetry (page 76)
हुस्न भी कम्बख़्त कब ख़ाली है सोज़-ए-इश्क़ से
बिस्मिल सईदी
दोहराई जा सकेगी न अब दास्तान-ए-इश्क़
बिस्मिल सईदी
वही होती है रहबर जो तमन्ना दिल में होती है
बिस्मिल सईदी
रह-रव-ए-राह-ए-मोहब्बत कौन सी मंज़िल में है
बिस्मिल सईदी
कौन समझे इश्क़ की दुश्वारियाँ
बिस्मिल सईदी
कब से उलझ रहे हैं दम-ए-वापसीं से हम
बिस्मिल सईदी
बैठा नहीं हूँ साया-ए-दीवार देख कर
बिस्मिल सईदी
अब इश्क़ रहा न वो जुनूँ है
बिस्मिल सईदी
'बिस्मिल' बुतों का इश्क़ मुबारक तुम्हें मगर
बिस्मिल अज़ीमाबादी
मेरी दुआ कि ग़ैर पे उन की नज़र न हो
बिस्मिल अज़ीमाबादी
ये कैसी आग अभी ऐ शम्अ तेरे दिल में बाक़ी है
बिस्मिल इलाहाबादी
क्या रौशनी-ए-हुस्न-ए-सबीह अंजुमन में है
बिशन नरायण दराबर
ज़ब्त-ए-नाला दिल-ए-फ़िगार न कर
बिर्ज लाल रअना
जिस की हर बात में क़हक़हा जज़्ब था मैं न था दोस्तो
बिमल कृष्ण अश्क
हो गया लाग़र जो उस लैला-अदा के इश्क़ में
भारतेंदु हरिश्चंद्र
ग़ज़ब है सुर्मा दे कर आज वो बाहर निकलते हैं
भारतेंदु हरिश्चंद्र
दिल मिरा तीर-ए-सितम-गर का निशाना हो गया
भारतेंदु हरिश्चंद्र
लड़ गई उन से नज़र खिंच गए अबरू उन के
बेताब अज़ीमाबादी
अक़्ल दौड़ाई बहुत कुछ तो गुमाँ तक पहुँचे
बेताब अज़ीमाबादी
सौदा-ए-इश्क़ और है वहशत कुछ और शय
बेख़ुद देहलवी
अब आप कोई काम सिखा दीजिए हम को
बेख़ुद देहलवी
तेशे से कोई काम न फ़रहाद से हुआ
बेख़ुद देहलवी
शम-ए-मज़ार थी न कोई सोगवार था
बेख़ुद देहलवी
लड़ाएँ आँख वो तिरछी नज़र का वार रहने दें
बेख़ुद देहलवी
क्या मिले आप की महफ़िल में भला एक से एक
बेख़ुद देहलवी
जो तमाशा नज़र आया उसे देखा समझा
बेख़ुद देहलवी
जताए जाते हैं एहसान भी सता के मुझे
बेख़ुद देहलवी
हो के मजबूर आह करता हूँ
बेख़ुद देहलवी
हिजाब दूर तुम्हारा शबाब कर देगा
बेख़ुद देहलवी
हज़रत-ए-दिल ये इश्क़ है दर्द से कसमसाए क्यूँ
बेख़ुद देहलवी
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