चलो चलें Poetry (page 58)

ग़ज़ल में जान पड़ी गुफ़्तुगू में फूल खिले

अरशद अब्दुल हमीद

हैराँ हूँ कि ये कौन सा दस्तूर-ए-वफ़ा है

अर्श सिद्दीक़ी

दरवाज़ा तिरे शहर का वा चाहिए मुझ को

अर्श सिद्दीक़ी

बैठा हूँ वक़्फ़-ए-मातम-ए-हस्ती मिटा हुआ

अर्श सिद्दीक़ी

कश्ती-ए-दिल नज़्र-ए-तूफ़ाँ हो गई

अर्श सहबाई

हज़ार हादसात-ए-ग़म रवाँ-दवाँ लिए हुए

अर्श सहबाई

हुआ है क़र्या-ए-जाँ में ये सानेहा कैसा

अरमान नज्मी

तह-ए-अफ़्लाक ही सब कुछ नहीं है

अरमान नज्मी

निगाह-ए-तिश्ना से हैरत का बाब देखते हैं

अरमान नज्मी

न हर्फ़-ए-शौक़ न तर्ज़-ए-बयाँ से आती है

अरमान नज्मी

कभी तो आ के मिलो मेरा हाल तो पूछो

अरमान नज्मी

जाने किस आलम-ए-एहसास में खोए हुए हैं

अरमान नज्मी

गुज़रते दिन के दुखों का पता तो देता था

अरमान नज्मी

तुम्हें खोजती हैं जो आँखें

आरिफ़ा शहज़ाद

मैं अब उक्ता गया हूँ फुर्क़तों से

आरिफ़ इशतियाक़

हयूले

आरिफ़ अब्दुल मतीन

ज़मीं से ता-ब-फ़लक कोई फ़ासला भी नहीं

आरिफ़ अब्दुल मतीन

तिरे बाज़ुओं का सहारा तो ले लूँ मगर इन में भी रच गई है थकन

आरिफ़ अब्दुल मतीन

मज़ा देता है याद आ कर तिरा बिस्मिल बना देना

अनवरी जहाँ बेगम हिजाब

मेरी नज़र के लिए कोई रिवायत न थी

अनवर सिद्दीक़ी

जब फ़स्ल-ए-बहाराँ आती है शादाब गुलिस्ताँ होते हैं

अनवर सहारनपुरी

नया शहर

अनवर सदीद

तुझ को तो क़ुव्वत-ए-इज़हार ज़माने से मिली

अनवर सदीद

निगाह-ओ-दिल से गुज़री दास्ताँ तक बात जा पहुँची

अनवर साबरी

रुख़ से पर्दा उठा दे ज़रा साक़िया बस अभी रंग-ए-महफ़िल बदल जाएगा

अनवर मिर्ज़ापुरी

आज मुझे कुछ लोग मिले हैं पागल से

अनवर मीनाई

दुनिया भी अजब क़ाफ़िला-ए-तिश्ना-लबाँ है

अनवर मसूद

नज़र आए क्या मुझ से फ़ानी की सूरत

अनवर देहलवी

न मैं समझा न आप आए कहीं से

अनवर देहलवी

मोहब्बत हो तो बर्क़-ए-जिस्म-ओ-जाँ हो

अनवर देहलवी

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