शरीर Poetry (page 31)

सितम की रस्में बहुत थीं लेकिन न थी तिरी अंजुमन से पहले

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

इश्क़ की आज इंतिहा कर दो

फ़ैसल फेहमी

बाकिरा

फ़हमीदा रियाज़

अबद

फ़हमीदा रियाज़

चार-सू है बड़ी वहशत का समाँ

फ़हमीदा रियाज़

मुझे कौन बुलाता रहता है

फ़हीम शनास काज़मी

अब तो कुछ भी याद नहीं

फ़हीम शनास काज़मी

तुम्हारे ब'अद जो बिखरे तो कू-ब-कू हुए हम

फ़हीम शनास काज़मी

धुँद में डूबी सारी फ़ज़ा थी उस के बाल भी गीले थे

फ़हीम शनास काज़मी

दिलों के बीच बदन की फ़सील उठा दी जाए

एज़ाज़ अफ़ज़ल

ना-सज़ा आलम-ए-इम्काँ में सज़ा लगता है

एजाज़ सिद्दीक़ी

धूप जवानी का याराना अपनी जगह

एजाज़ गुल

रह रहे हैं मकीं शबों के

एजाज़ गुल

महमिल है मतलूब न लैला माँगता है

एजाज़ गुल

मैं

एजाज़ फ़ारूक़ी

कतबा

एजाज़ फ़ारूक़ी

बे-नियाज़-ए-सौत-ओ-महरूम-ए-बयाँ रक्खा गया

एजाज़ अासिफ़

नज़्मों के लिए दुआ-ए-ख़ैर

एजाज़ अहमद एजाज़

मेरी मौत के मसीहा!

एजाज़ अहमद एजाज़

सता रही है बहुत मछलियों की बास मुझे

एहतिशाम अख्तर

बख़्श दी हाल-ए-ज़बूँ ने जल्वा-सामानी मुझे

एहसान दानिश

चाँद भी सितारों को साथ ले के चलता है

दिलकश सागरी

अब मुझ को एहतिमाम से कीजे सुपुर्द-ए-ख़ाक

दिलावर अली आज़र

यूँ दीदा-ए-ख़ूँ-बार के मंज़र से उठा मैं

दिलावर अली आज़र

मैं सुर्ख़ फूल को छू कर पलटने वाला था

दिलावर अली आज़र

कब तक फिरूंगा हाथ में कासा उठा के मैं

दिलावर अली आज़र

हवस से जिस्म को दो-चार करने वाली हवा

दिलावर अली आज़र

आग लग जाएगी इक दिन मिरी सरशारी को

दिलावर अली आज़र

नज़र आया न कोई भी इधर देखा उधर देखा

दीपक क़मर

फ़िदा अल्लाह की ख़िल्क़त पे जिस का जिस्म ओ जाँ होगा

दत्तात्रिया कैफ़ी

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