नाव Poetry (page 4)

जिस्म की कश्ती में आ

शहरयार

अजीब सानेहा मुझ पर गुज़र गया यारो

शहरयार

ऐसे हिज्र के मौसम कब कब आते हैं

शहरयार

नसीब-ए-चश्म में लिक्खा है गर पानी नहीं होना

शहराम सर्मदी

दरीचा आइने पर खुल रहा है

शहनवाज़ ज़ैदी

लहू का दाग़ न था ज़ख़्म का निशान न था

शाहिद कलीम

ज़लज़ले का था सफ़र जिस में की मस्ती हम ने

शाहिद जमील

अहल-ए-दुनिया के लिए ये माजरा है मुख़्तलिफ़

शाहीन बद्र

जब भी कश्ती के मुक़ाबिल भँवर आता है कोई

शहाब सफ़दर

जो गुज़रे है बर आशिक़-ए-कामिल नहीं मालूम

शाह नसीर

दिल को किस सूरत से कीजे चश्म-ए-दिलबर से जुदा

शाह नसीर

शक्ल-ए-जानाना जा-ब-जा हैं हम

शाह आसिम

तेज़ आँधी ने फ़क़त इक साएबाँ रहने दिया

शफ़ीक़ सलीमी

इन बला की आँधियों में इक शजर बाक़ी रहे

शफ़ीक़ सलीमी

कोई टूटी हुई कश्ती का तख़्ता भी अगर है ला

शफ़ीक़ जौनपुरी

नज़्म

शबनम अशाई

जो हो वरा-ए-ज़ात वो जीना ही और है

शानुल हक़ हक़्क़ी

उठ गई उस की नज़र मैं जो मुक़ाबिल से उठा

शाद आरफ़ी

सानेहे लाख सही हम पे गुज़रने वाले

सीमा नक़वी

आँख के साहिल पर आते ही अश्क हमारे डूब गए

सय्यद ज़िया अल्वी

सोख़्ता कश्ती का मलबा मैं मिरा दिल और शाम

सय्यद नसीर शाह

ये मेरी काग़ज़ी कश्ती है और ये मैं हूँ

सऊद उस्मानी

मता-ए-हर्फ़ भी ख़ुश्बू के मा-सिवा क्या है

सऊद उस्मानी

हिसाब-ए-तर्क-तअल्लुक़ तमाम मैं ने किया

सऊद उस्मानी

सूरमा जिस के किनारों से पलट आते हैं

सरवत हुसैन

पानी का हाथ

सरवत हुसैन

लफ़्ज़ों के दरमियान

सरवत हुसैन

दरख़्त मेरे दोस्त

सरवत हुसैन

सुब्ह के शोर में नामों की फ़रावानी में

सरवत हुसैन

पानियों में खेल कुछ ऐसा भी होना चाहिए था

सरफ़राज़ ख़ालिद

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