समाचार Poetry (page 56)

बला की चमक उस के चेहरे पे थी

अहमद मुश्ताक़

ये हम ग़ज़ल में जो हर्फ़-ओ-बयाँ बनाते हैं

अहमद मुश्ताक़

टूट गया हवा का ज़ोर सैल-ए-बला उतर गया

अहमद मुश्ताक़

मुझे उस ने तिरी ख़बर दी है

अहमद मुश्ताक़

मिल ही आते हैं उसे ऐसा भी क्या हो जाएगा

अहमद मुश्ताक़

कहूँ किस से रात का माजरा नए मंज़रों पे निगाह थी

अहमद मुश्ताक़

इक फूल मेरे पास था इक शम्अ' मेरे साथ थी

अहमद मुश्ताक़

चाँद भी निकला सितारे भी बराबर निकले

अहमद मुश्ताक़

भूले-बिसरे मौसमों के दरमियाँ रहता हूँ मैं

अहमद मुश्ताक़

बहता आँसू एक झलक में कितने रूप दिखाएगा

अहमद मुश्ताक़

ज़ख़्म खाना ही जब मुक़द्दर हो

अहमद महफ़ूज़

ये जो धुआँ धुआँ सा है दश्त-ए-गुमाँ के आस-पास

अहमद महफ़ूज़

सवाद-ए-शाम न रंग-ए-सहर को देखते हैं

अहमद महफ़ूज़

अब इस मकाँ में नया कोई दर नहीं करना

अहमद महफ़ूज़

आख़िरुल-अम्र तिरी सम्त सफ़र करते हैं

अहमद जावेद

शीराज़ की मय मर्व के याक़ूत सँभाले

अहमद जहाँगीर

हूँ कि जब तक है किसी ने मो'तबर रक्खा हुआ

अहमद हुसैन मुजाहिद

दूर से यूँ दिया मुझे बोसा

अहमद हुसैन माइल

शब-ए-माह में जो पलंग पर मिरे साथ सोए तो क्या हुए

अहमद हुसैन माइल

क्या रोज़-ए-हश्र दूँ तुझे ऐ दाद-गर जवाब

अहमद हुसैन माइल

हो गए मुज़्तर देखते ही वो हिलती ज़ुल्फ़ें फिरती नज़र हम

अहमद हुसैन माइल

आफ़्ताब आए चमक कर जो सर-ए-जाम-ए-शराब

अहमद हुसैन माइल

उधर की शय इधर कर दी गई है

अहमद हमेश

वो अपने ज़ोम में था बे-ख़बर रहा मुझ से

अहमद फ़राज़

नासेहा तुझ को ख़बर क्या कि मोहब्बत क्या है

अहमद फ़राज़

किसे ख़बर वो मोहब्बत थी या रक़ाबत थी

अहमद फ़राज़

जो ग़ज़ल आज तिरे हिज्र में लिक्खी है वो कल

अहमद फ़राज़

जो ग़ैर थे वो इसी बात पर हमारे हुए

अहमद फ़राज़

बहुत दिनों से नहीं है कुछ उस की ख़ैर ख़बर

अहमद फ़राज़

ज़ेर-ए-लब

अहमद फ़राज़

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