विचार Poetry (page 18)

ये ज़ुल्म है ख़याल से ओझल न कर उसे

साक़ी फ़ारुक़ी

ये किस ने भरम अपनी ज़मीं का नहीं रक्खा

साक़ी फ़ारुक़ी

वो ख़ुश-ख़िराम कि बुर्ज-ए-ज़वाल में न मिला

साक़ी फ़ारुक़ी

वहशत दीवारों में चुनवा रक्खी है

साक़ी फ़ारुक़ी

हिरास फैल गया है ज़मीन-दानों में

साक़ी फ़ारुक़ी

अभी नज़र में ठहर ध्यान से उतर के न जा

साक़ी फ़ारुक़ी

तू नहीं तो तिरा ख़याल सही

साक़ी अमरोहवी

कौन पुर्सान-ए-हाल है मेरा

साक़ी अमरोहवी

गई नहीं तिरे ज़ुल्म-ओ-सितम की ख़ू अब तक

संजय मिश्रा शौक़

तब के क्या हासिल-ए-वफ़ा होगा

संदीप कोल नादिम

आब-ए-हैराँ पर किसी का अक्स जैसे जम गया

समीना राजा

हम तो यूँ उलझे कि भूले आप ही अपना ख़याल

समीना राजा

वो आरज़ू कि दिलों को उदास छोड़ गई

समद अंसारी

वो एक ख़्वाब जो फिर लौट कर नहीं आया

सलमान अख़्तर

वो पास रह के भी मुझ में समा नहीं सकता

सलमान अख़्तर

कभी मिली है जो फ़ुर्सत तो ये हिसाब किया

सलीम शुजाअ अंसारी

जब आसमान ज़मीं पर उतरने लगता है

सलीम शुजाअ अंसारी

हज़ारों रंज मिले सैंकड़ों मलाल मिले

सलीम शुजाअ अंसारी

ग़ुबार-ए-फ़िक्र को तहरीर करता रहता हूँ

सलीम शुजाअ अंसारी

दिल में औरों के लिए कीना-ओ-कद रखते हैं

सलीम शुजाअ अंसारी

न छीन ले कहीं तन्हाई डर सा रहता है

सालिम सलीम

फिर न आएगा ये लम्हा सोच ले

सलीम शहज़ाद

ये फ़ैसला भी मिरे दस्त-ए-बा-कमाल में था

सलीम शाहिद

मैं ख़याल हूँ किसी और का मुझे सोचता कोई और है

सलीम कौसर

फिर जी उठे हैं जिस से वो इम्कान तुम नहीं

सलीम कौसर

मैं ख़याल हूँ किसी और का मुझे सोचता कोई और है

सलीम कौसर

ऐ शब-ए-हिज्र अब मुझे सुब्ह-ए-विसाल चाहिए

सलीम कौसर

आब ओ हवा है बरसर-ए-पैकार कौन है

सलीम कौसर

तिरी तलाश में गुज़रे कई ज़माने मुझे

सलीम काशीर

लफ़्ज़ ले कर ख़याल की वुसअत

सलीम फ़िगार

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