खुशबू Poetry (page 7)

कुछ इस अंदाज़ से हैं दश्त में आहू निकल आए

सय्यद मंज़ूर हैदर

एक इश्क़ की नस्ली तारीख़

सय्यद काशिफ़ रज़ा

था मगर इतना ज़ियादा तो जुनूँ-ख़ेज़ न था

सय्यद काशिफ़ रज़ा

मंसब-ए-इश्क़ से कुछ ओहदा-बरा मैं ही हुआ

सय्यद काशिफ़ रज़ा

ख़ुदा हुआ न कोई और ही गवाह हुआ

सय्यद काशिफ़ रज़ा

बेवफ़ा था तो नहीं वो, मगर ऐसा भी हुआ

सय्यद काशिफ़ रज़ा

मिट्टी तिरे महकने से मुझ को गुमान है

सय्यद अनवार अहमद

न जाने रौज़न-ए-दीवार क्या जादू जगाता है

सय्यद अमीन अशरफ़

कहीं शो'ला कहीं शबनम, कहीं ख़ुशबू दिल पर

सय्यद अमीन अशरफ़

हल्क़ा-ए-शाम-ओ-सहर से नहीं जाने वाला

सय्यद अमीन अशरफ़

उतर के धूप जब आएगी शब के ज़ीने से

सय्यद अहमद शमीम

ऊँची नीची पेच खाती दौड़ती काली सड़क

सय्यद अहमद शमीम

किस तरह ज़िंदा रहेंगे हम तुम्हारे शहर में

सय्यद अहमद शमीम

उस के होंटों पर सुर महका करते हैं

स्वप्निल तिवारी

वजूद मिट गया परवानों के सँभलने तक

सालेह नदीम

ऐसी ख़ुशबू तू मुझे आज मयस्सर कर दे

सुमन ढींगरा दुग्गल

तुझ में सब मंज़र महफ़ूज़

सुलतान सुबहानी

तेरी आँखों पे घने ख़्वाबों का पहरा हूँ मैं

सुलतान सुबहानी

अभी तक साँस लम्हे बुन रही है

सुलतान सुबहानी

मौसम-ए-गुल कुंज-ए-गुलशन निकहत-ए-गेसू न हो

सुलतान रशक

जाने क्यूँ बातों से जलते हैं गिले करते हैं लोग

सुलतान रशक

नफ़स नफ़स इज़्तिराब में था

सुल्तान अख़्तर

हर इक लम्हा हमें हम से जुदा करती हुई सी

सुल्तान अख़्तर

न ढलती शाम न ठंडी सहर में रक्खा है

सुलेमान ख़ुमार

कचोके दिल को लगाता हुआ सा कुछ तो है

सुलेमान ख़ुमार

प्यार का दर्द का मज़हब नहीं होता कोई

सुलैमान अरीब

सीलन

सुबोध लाल साक़ी

हम ने ख़तरा मोल लिया नादानी में

सुबोध लाल साक़ी

क्यूँ तिरे गेसू कूँ गेसू बोलनाँ

सिराज औरंगाबादी

ज़बान-ए-ख़ल्क़ को चुप आस्तीं को तर पा कर

सिद्दीक़ मुजीबी

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