मर Poetry (page 6)

दिन के पहले पहर मैं ही अपना बिस्तर छोड़ कर

स्वप्निल तिवारी

किसी मस्त-ए-ख़्वाब का है अबस इंतिज़ार सो जा

सुरूर जहानाबादी

और कोई दम की मेहमाँ है गुज़र जाएगी रात

सुरूर बाराबंकवी

सिर्फ़ थोड़ी सी है अना मुझ में

सुहैल अख़्तर

हमारे जैसे ही लोगों से शहर भर गए हैं

सुहैल अख़्तर

वो एक लड़की जो ख़ंदा-लब थी न जाने क्यूँ चश्म-तर गई वो

सूफ़िया अनजुम ताज

वो थे पहलू में और थी चाँदनी रात

सूफ़ी तबस्सुम

तुम न घबराओ मिरे ज़ख़्म-ए-जिगर को देख कर

सुदर्शन फ़ाकिर

रग-ए-जाँ में समा जाती हो जानाँ

सुबहान असद

इक रौशनी का ज़हर था जो आँख भर गया

सोहन राही

वो ज़कात-ए-दौलत-ए-सब्र भी मिरे चंद अश्कों के नाम से

सिराज लखनवी

तुझ पर फ़िदा हैं सारे हुस्न-ओ-जमाल वाले

सिराज औरंगाबादी

हम हैं मुश्ताक़-ए-जवाब और तुम हो उल्फ़त सीं बईद

सिराज औरंगाबादी

दिल में तूफ़ान नहीं आँख में सैलाब नहीं

सिरज़ अालम ज़ख़मी

जलने में क्या लुत्फ़ है ये तो पूछो तुम परवाने से

सिकंदर हयात ख़याल

सड़क-छाप

सिदरा सहर इमरान

सफ़र की धूप ने चेहरा उजाल रक्खा था

सिदरा सहर इमरान

ग़ाज़ा तो तिरा उतर गया था

सिद्दीक़ अफ़ग़ानी

आग को फूल कहे जाएँ ख़िर्द-मंद अपने

सिद्दीक़ शाहिद

अबस है दूरी का उस के शिकवा बग़ल में अपने वो दिल-रुबा है

श्याम सुंदर लाल बर्क़

करता है रहम कौन किसी बे-गुनाह पर

शऊर बलगिरामी

कुछ नहीं बोला तो मर जाएगा अंदर से 'शुजाअ'

शुजा ख़ावर

मेरा दिल हाथों में लो तो क्या तुम्हारा जाएगा

शुजा ख़ावर

मैं जब्हा सा हूँ उस दर-ए-आली-मक़ाम का

शोला अलीगढ़ी

वक़्त आफ़ाक़ के जंगल का जवाँ चीता है

शेर अफ़ज़ल जाफ़री

अब तो घबरा के ये कहते हैं कि मर जाएँगे

ज़ौक़

रिंद-ए-ख़राब-हाल को ज़ाहिद न छेड़ तू

ज़ौक़

किसी बेकस को ऐ बेदाद गर मारा तो क्या मारा

ज़ौक़

कब हक़-परस्त ज़ाहिद-ए-जन्नत-परस्त है

ज़ौक़

चश्म-ए-क़ातिल हमें क्यूँकर न भला याद रहे

ज़ौक़

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